Monday, December 26, 2011

हुसैन के घोड़े

मैं समझना चाहता हूँ
तुम्हारे होने का मतलब
मैं उलझना चाहता हूँ
हर उस चीज से जो तुम तक जाती है
मैं पकड़ना चाहता हूँ
तुम्हारे सोचने के तरीके को
कि विवाद घूम-घूमकर
क्यूँ चले आते थे तुम तक
कि कोई पहचान तुमपर चिपकती क्यों नहीं थी
कि वह जगह किसने बेंच खाई
गुंजाइश थी जहाँ खड़े होकर बात करने की
कि दीवारों के आर-पार या तो घुटन है या शोर
या तो साजिशें हैं या फिर चीख

तर्क करने की नहीं डरने की चीज है अब
मैं जो सोचना भी चाहूँ तो डर लगता है---
कोई पढ़ रहा है मेरे विचार
और हो रहा है आहत !

हुसैन, अच्छा है तुम्हारे घोड़े बेलगाम हैं
वे नहीं जानते लोहे का स्वाद
और ये बात लुहारों को अखरनी ही चाहिए
कि उनके हथौड़े , आग और चोट पर
हर बार भारी पड़ जाते रहे तुम्हारे घोड़े ।

  

Wednesday, November 23, 2011

विदाई.... एक व्यक्तिगत कथा

कहीं छोड़ आया हूँ
अपनी एक प्यारी-सी चीज
शाम के धुंधलके में
कोहरा ओढ़े दूर जंगल में
लांघकर शहर, गाँव, पहाड़ , नदियाँ .
मन उदास है, गहरा उदास
मन चुप है, निहायत चुपचाप
दुःख हो , ऐसा नहीं लगता
दर्द है , कुछ-कुछ प्रिय-सा.


सर्पीली सड़कों से गुजरते हुए
सुनाता रहा पहाड़ी लड़की का गीत
बालों में घुमाते हुए उँगलियाँ
बांटता रहा अतीत के किस्से
हिस्से-हिस्से खोलता रहा
मन के तमाम बंद कमरे
दिखाता रहा कोने-अंतरे एक-एककर
पोर-पोर बींधती रही आकुल तृप्ति .


स्मृति के निर्झर झरते रहे कलकल
अविकल ऊँचाइयों  से उतरते
खुल गयीं सब गांठें मन की
और फैल गयी चांदनी रात
किरण-किरण चीड के पेड़ों पर
बात करते, बात सुनते .


देह तपी थी सोना हो गयी 
मन कांपा था अर्घ्य की तरह
संस्कार सब छीज गए
रीत गया बूँद-बूँदकर अहम्
बची रह गयी बस एक कसक
खालीपन से भरी-भरी .


नदियाँ-पहाड़-जंगल सब पार किये
पार किया केशों का गझिन आकर्षण
देह का दीप्त दरिया
मन का मोहक आकाश
और छोड़ आया
अपना  एक हिस्सा
कोहरा ओढ़े जंगल में.


वापसी को मुड़े कदम कांपे
कांपा कहीं भीतर विश्वास
स्वयं के मज़बूत होने का
हिलते हाथों संग हिला
अधिकार का महीन आवरण
और उग आयीं पीठ पर एक जोड़ी आँखें.





  

Thursday, October 27, 2011

हमारे प्रेम का शहर

न उस शहर मे अब तुम रहती हो
न उस शहर मे अब मै रहता हूँ

पर हम दोनो ही के पास है
अपने-अपने हिस्से का वह शहर
जो कहीँ भी बस जाता है
आपस मे बात करते ही.


यह और बात है कि
प्रेम करने से होने तक की खबर
क़त्ल की कहानियो के साथ छपती थी
हमारे शहर के अखबार मे
रास्ते किनारे पेड पर अटकी लाल रिबन-सी याद
हवाओ मे फडफडाती अब भी है
समय के साथ बदरंग होकर भी.


शहर बदलता है और लोग भी

गली-मोहल्लो-चौराहो की सूरत के साथ

मगर ज़िन्दा रहता है एक शहर
हमारे-तुम्हारे भीतर बचे प्रेम-सा

बिल्कुल वैसा ही मन के किसी कोने मे

जैसा देखा था हमने उसे एक-दूसरे के प्रेम मे.

Monday, September 19, 2011

मन की पोथी

बांटता ग़म सभी साथ तेरे मगर 
तुझपे जाने मुझे क्यों भरोसा न था
यह नहीं कि तुझे मैंने पूजा नहीं 
या कभी टूटकर तूने चाहा  न था

      मेरी आँखें प्रिये तेरी आँखों में थीं
     तेरी साँसों की मधुगंध थी सांस में
     मेरे होंठों से पिघली हँसी में तू ही 
     दर्द-सा ले फिरा तुझको एहसास में

पर निरंतर रही टीसती एक व्यथा
अश्रुजल में तेरे जिसको धोया न था

      साँझ की हर ढलकती किरण लिख गयी 
     मौन के अक्षरों में कथाएँ कई
     रात-सा मन पसरता रहा दूर तक
     बाँध लेने को लाखों व्यथाएँ नई

भागवत की कथा-सा मैं बहता मगर
आवरण मन की पोथी का खोला न था . 

Wednesday, September 7, 2011

तुम्हारी पाती

तुम्हारी पाती मिली अबोध 
तुम्हारी पाती मिली अजान
नयन के कोरों पर चुपचाप
उभर आई पिछली पहचान 

     किताबों में डूबा मैं आज 
     ढूंढता  था जीवन के राज़ 
     तभी धीरे से आकर पास 
     तुम्हारे ख़त ने दी आवाज़

मुझे खोलो मैं थककर चूर
संभालो लाया हूँ मुस्कान 

     नयन से देखा जैसे गीत 
     लिया अधरों से छू संगीत 
     लगा है ऐसा ही कुछ आज
     तुम्हारा ख़त पाकर मनमीत 

उडूं मैं नभ में पांखें खोल
सुनाता फिरूं तुम्हारे गान

     जगे हैं सोए मन के भाव 
     अखरने लगा बहुत अलगाव
     न जाने बीते दिन क्यों आज
     कसकते जैसे कोई घाव 

हिये की पगली छिछली पीर
गयी अधरों पर बन मुस्कान
तुम्हारी पाती मिली अबोध 
तुम्हारी पाती मिली अजान.

(प्रथम दो पंक्तियाँ स्व. डॉ धर्मवीर भारती जी से साभार)



Wednesday, August 31, 2011

पल्टुआ, भैंस और स्टीफन हाकिंग

पल्टुआ बतियाता ही रह गया 
खड़ा नीम की आड़ में
गवने से लौटी
दुक्खी काका की बेटी फुलमतिया से
और भैंस चर गयी लोबिया 
चन्नर पांड़े के तलहवा खेत में.

हमारे समय के 
सबसे बड़े ब्रह्माण्डवेत्ता -- स्टीफन हाकिंग     
कह रहे हैं 
स्वर्ग-नरक कुछ भी नहीं 
कुछ नहीं बचता मृत्यु के बाद 
मर जाता है 
बस मर जाता है
एक बारगी ही समूचा अस्तित्व 
गणितीय प्रमेयों के अंतिम निष्कर्ष यही कहते हैं.

पल्टुआ सिंगुलरीटी थेओरम्स नहीं जानता
नहीं जानता क्वांटम ग्रेविटी 
भैंस को भी नहीं पता 
चमरौंधा लेकर आ रहे हैं चन्नर पांड़े
लुढ़कते-पुढ़कते-गरियाते 
फुलमतिया भी जानती है तो बस इतना --
देख ली गयी तो बदनामी होगी .

मैं , जो कि द्रष्टा हूँ 
कन्फ्यूज हो गया हूँ
सेकेण्ड ला ऑफ़ थर्मोडायनेमिक्स मदद नहीं करता 
और न ही अनसर्टेंटी प्रिंसिपल 

साइकोलोजिकल ऐरो ऑफ़ टाइम कहता है 
भैंस पिटेगी और पल्टुआ गरियाया जायेगा 
फुलमतिया भाग निकलेगी घर की ओर

थर्मोडायनेमिक ऐरो ऑफ़ टाइम बताता है
भैंस के पेट में पहुँच गया लोबिया
अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर गमन है
घटती लगती है एंट्रोपी
पर यह अनर्थ है,
चबाने में भैंस ने खर्च की जो ऊर्जा
बढ़ा देती है वह ब्रह्माण्ड की सकल एंट्रोपी
अर्थात अव्यवस्था !

यानी की बढ़ रहा है सब कुछ
व्यवस्था से अव्यवस्था की ओर
सतत अबाधित
और मैं जितना समझ पाता हूँ इस मामले में
भैंस भी करती है प्रभावित ब्रह्माण्ड को
उतना ही जितना कि स्टीफन हाकिंग .

Sunday, August 21, 2011

एक बरसाती रात

रात आई बहुत देर तक याद तू 
रात बादल गरजते रहे देर तक
रात आँखों में चुभती रही रौशनी 
रात जुगनू चमकते रहे देर तक

रात आंधी चली रात बिजली गिरी
जाने किसके भला आशियाने जले 
ख़त मिला था तेरा कल ढली सांझ को
और तेरे ही ख़त सब पुराने जले

रात बजती रही धुन कोई अनसुनी  
रात वादे कसकते रहे देर तक

रात मैंने किये पुण्य संकल्प सब
प्रिय सुनो यह सभी अब तुम्हारे हुए
रात मैंने लिखी एक ताज़ा ग़ज़ल 
तन को जीते हुए मन को हारे हुए

रात बीते बरस आँख की कोर से 
धीरे-धीरे छलकते रहे देर तक

रात आये न जाने कहाँ से भला
और बादल उड़ाकर कहाँ ले गए  
चढ़ते सूरज की पावन गवाही में जो 
स्वप्न आँखों में अपनी संभाले गए

रात उठती रही देर तक गंध भी 
रात सपने महकते रहे देर तक 
 

Saturday, July 23, 2011

बरसो सावन बरसो

बरसो सावन बरसो

गोबर की परधानी भीगे
काली कुतिया कानी भीगे
इटली की महारानी भीगे
आँख का उनकी पानी भीगे
बरसो सावन बरसो

मनमोहन और अन्ना भीगें
खाकी लाल घुटन्ना भीगें
लोकपाल कंधे पर धरके
नाचें तन्ना-तन्ना भीगें
बरसो सावन बरसो

खाएं प्रिंस पकोड़ा भीगें
हसन अली के घोडा भीगें
राजा और यदियुरप्पा से कुछ  
बचे-खुचे तो कौडा  भीगें
बरसो सावन बरसो

जनपथ भीगे संसद भीगे
इजलासों का गुम्बद भीगे
छाती पर चढ़कर बैठी  जो
काठ की कुर्सी शायद भीगे
बरसो सावन बरसो
बरसो सावन बरसो




Wednesday, July 20, 2011

सावन के मेघ

जाने किसकी आँखें उमड़ीं
नभ में छाए काले मेघ
किस विरही के भेजे आए
क्या संदेश संभाले मेघ

     तन की पाती मन के नाम
     भूला-बिसरा कोई काम
     याद दिलाने को आयी है
     फिर सावन की भीगी शाम

बरस रहे हैं धो डालेंगे
विस्मृतियों के जाले मेघ ।

Friday, July 15, 2011

जीवधारी रुपए

गाड़े हुए रुपए जीवधारी हो जाते हैं
एक लंबे समय के बाद
एक लंबे समय पहले सुनी थी यह बात
दादी से किसी कहानी के दरम्यान

लंबे समय पहले की बातें
सच ही हो जाती हैं
लंबे समय के बाद

अब नहीं गाड़ता है कोई भी
रुपए दीवार या ज़मीन में
यह तमाम जीवधारी रुपए
डोलते फिरते हैं जो
राजपथ-जनपथ-संसद के गलियारों में
पुराने दिनों के गाड़े हुए हैं

कहानियाँ दादी की थीं
दादी कहानियों में चली गईं
लंबा समय अब लंबा नहीं रहा
जीवधारी रुपए अब लौटाने ही होंगे
अपने गड्ढों में लंबे समय के बाद
संभलने लगी हैं कुदालें
कसमसाने लगे हैं उनके बेंट
और ज़मीनें तैयार होने लगी हैं ।

Tuesday, July 5, 2011

तुमको बात बदलते देखा

हमने सूरज ढलते देखा
सुबहो-शाम पिघलते देखा

घर से माँ का ख़त आया है
आँखें मलते-मलते देखा

इस सावन में घर जाऊंगा
सपना चलते-चलते देखा

देखी होगी राह किसी ने
दोपहरी को गलते देखा

मन जाने कैसा हो आया
तुमको बात बदलते देखा

तुम भी अपने-से लगते हो
तुमको भी मन छलते देखा

शायद फागुन आने वाला
मन को आज फिसलते देखा

आज किसी ने सच बोला है
पत्थर आज सँभलते देखा

Wednesday, June 29, 2011

मुहब्बत कोई कैजुअल लीव नहीं

दुनिया को मुहब्बत का उपदेश देने वालो ,
तुम देहरी पर ठिठक कर लौट आए
और पीट दिया ढिंढोरा--
सब पा लिया आदि-अंत अनंत का !
उपलब्धि की कसौटी पर कसा और
लटका लिया पदक-सा गले में.

मुहब्बत कोई कैजुअल लीव नहीं
जो ली और फिल्म देख आये
या फिर पुराने किले की सुनसान ढलानों पर
घड़ी-दो घड़ी लेटे लौट आए
मुहब्बत हंसिये की मूठ पर चमकता पसीना है
जिसे जेठ  के तमतमाए  सूरज ने देखा
और खौफ खा गया.

मुहब्बत न राम की मर्यादा है
न लक्ष्मण की भ्रातृनिष्ठा
और न ही रघुकुल की तथाकथित रीति
मुहब्बत सीता की अग्निपरीक्षा है
अविश्वासी को जिसने युगों का बनवास दिया.

मुहब्बत अर्जुन का गांडीव नहीं
कृष्ण का सुदर्शन चक्र भी नहीं
मुहब्बत रथ का वह टूटा हुआ पहिया है
मान-मर्दन किया महारथियों का जिसने
युगों के लिए उन्हें श्रीहीन कर दिया .

मुहब्बत न यह धरती है न ये सरहदें
न गोलियां,  न टैंक,  न कंटीली बाड़ें 
मुहब्बत फौजी के उस बूढ़े बाप का कलेजा है
जो कहता है-- काश मेरा एक और बेटा होता !

मुहब्बत न गीता है, न बाइबिल, न कुरान
न मंदिर की आरती है न मस्जिद की अजान
मुहब्बत वह धूप है
जो दोनों की सहन में बराबर उतरती है
मुहब्बत वह हवा है
जो दोनों की धूल बराबर बुहारती है.

दुनिया को मुहब्बत का उपदेश देनेवालो !
मुहब्बत वह बारिश है
जो सबका रंग-रोगन धो देती है
और नंगा कर देती है
पाखण्ड के ढांचों को
देह की दीवार को
परम्पराओं को , किताबों को
सिद्धांत के खांचों को.


Friday, June 24, 2011

अपने बेटे की ओर से

तुमने कभी कहा नहीं
और मैं समझता रहा
तुम जानते ही नहीं
पिता, तुम्हारा मौन चुप्पी नहीं
यह रहा है स्वीकृति
मेरे बड़े होते जाने की
उम्र और समझदारी में
या शायद दुनियादारी में

पिता, तुम्हारे मौन को
अनदेखा करना नहीं कह सकता मैं
मैं नहीं कह सकता इसे तटस्थता
बर्फ की तरह निष्पंद और ठंडी
कठोर... जम जाने की हद तक.

पिता, मेरे बड़े होने में बड़ा हुआ है
कहीं कोई अंश तुम्हारा भी
मेरे बढ़ने जितना ही घटनापूर्ण है
मुझे बढ़ते देखकर तुम्हारा मौन रह जाना

पिता, जितना मैं समझ पाया हूँ
यह मौन सिर्फ मेरे-तुम्हारे बीच का नहीं
यह दो पीढ़ियों की थाती है
जिसे ढोना  हमेशा सलीब का ढोना नहीं होता 
हर बार अपने सामान के साथ
अनायास बांसुरी का रख जाना भी होता है

पिता, मुझे लगता है 
कि मैं समझता हूँ तुम्हारा मौन
पर हर बार एक अलग तरीके से . 


Saturday, June 18, 2011

आषाढ़स्य प्रथम दिवसे

बादल तुमको उपमाओं में
बाँधा हर युग , हर कवि ने
लेकिन क्या तुम बंध पाए हो
या क्या तुम बंध पाओगे
दूर समय की सीमाओं में ?
जाने क्यों लगता है ऐसा 
जैसे तुम आकाश नहीं
एक अंश हो मेरे मन का
हर पल जिसमें घुमड़ा करते
शक्तिवान सौ-सौ तूफान
हर पल बदला करते चेहरे
उमड़-घुमड़ लाखों विचार
मन फिर भी वही है रहता--
चिर एकाकी निर्विकार !

इतना गरजे, इतना बरसे
धरती का रंग बदल दिया
पौधों में जीवन सरसाया
सागर को कर दिया अपार
लेकिन क्या तुम छू पाए हो 
आसमान को एक निमिष भी ?
क्या अविरल धारा बूंदों की 
भिगो सकी है एक अंश भी ?
बादल! भटकोगे अनंत तक 
तो भी कुछ तुम पा न सकोगे
अंत समय जब लेखोगे तुम
जीवन भर के कर्म-अकर्म
निश्चय ही पाओगे सबका 
योग सिर्फ तुम एक सिफ़र !

इधर ढकोगे उधर खुलेगा 
इतना विस्तृत है आकाश .
आओ बैठो पल-दो पल हम 
कह लें- सुन लें अपनी-अपनी
फिर जाने कब मिलना होगा
फिर कब ऐसी धूप ढलेगी
फिर जाने कब रात की रानी 
इच्छाओं-सी हमें छलेगी
फिर जाने कब भोर का तारा
छू पाएँगे आँखों से
फिर जाने कब सो पाएँगे 
रजत-परी की  पांखों में
उजले-उजले दूध धुले-से
तुम , मैले मत हो जाना
इधर सरककर पास जरा-सा 
आओ बैठो घड़ी-दो घड़ी .
क्या कहते हो , देर हो रही ?
अरे, कहो, कहाँ जाओगे ?
कौन देखता राह तुम्हारी ?

मुझको जाना दूर यहाँ से
वहां जहाँ सब प्यासी ऑंखें
आसमान को ताक रही हैं 
ताल-तलैया-पोखर-सरवर
पनघट-पनघट झाँक रही हैं
मुझे भूमि के फटे कलेजे
पर मरहम का लेप लगाना
झाड़-झंखाड़ी  में उग आये
नीम-पीपलों को नहलाना
मुझे पाटने ताल-पोखरे
मुझे डुबोने बाग़-बगीचे
सुनो ,सुनाई देगा तुमको
होता है मेरा आवाहन---
'काठ-कठौती पीयर धोती
मेघा साले पानी दे'
नंग-धड़ंगे बच्चे भू पर
लोट रहे, जलपोट  रहे
नीचे जलती धरती ऊपर
डाल रहे गगरी से पानी .

जाना है, अब जाना मुझको
ले धरती की चूनर धानी
अगले फागुन आऊंगा मैं--
आस धराती पिय  की पाती---  
--- अभी सेठ कुछ दिक्कत में है
     अभी पगार नहीं मिली
     फिर भी मैं कुछ भेज रहा हूँ
     देखो, यह जो पैसे हैं ना
     मोहन के जूते ले देना
     कुछ बाबू को तम्बाकू के
     कुछ बनिए का पिछला दे देना 
     माँ की तिथि भी तो करनी है 
     मंदिर में सीधा दे आना
     अपनी तबियत का ध्यान रहे
     मत बहुत सबेरे उठा करो
     खाद डालनी होगी शायद
     अब तो निचली क्यारी में
     हाथ तंग है ले-लेना तुम 
     कुछ सामान उधारी में
     अगले फागुन आऊंगा मैं
     देखो कोई फिक्र न करना...

अरे , कहाँ मैं अटक गया
देखो कैसा भटक गया
जाना है, अब जाना मुझको
दूर आम के बागीचों में
आसन मारे जमे अल्हैते
थाप-थाप धम ढिम्म-ढिम्म
सब ताक रहे नभ सूनी आँखों .
रामलाल की लहुरी बेटी
टिकी बांस से मडवे  के
सर पियरी से ढंके हुए
मन में दुहराती है कजरी
फिर बीच-बीच में आंख उठाकर 
देख लिया करती है ऊपर---
जाने झूला पड़े- ना पड़े !

तुम कहते हो रुक जाऊं  मैं
जीवन-धन का जोड़ करूँ ! 
तिल-तिल जलकर पा न सकूँगा
जीवन में ऊँचा मुकाम !

रुक जाऊँगा, तुम कहते हो 
तो मैं निश्चित रुक जाऊँगा
यदि तुम मिटा सको दुनिया से 
अश्रु-निराशा-दुःख-वेदना,
यदि तुम बदल सको हर्फों को 
परदेशी के पत्रों के, 
यदि तुम झूले डाल सको हर
रामलाल की बेटी खातिर,
यदि तुम बदल सको स्वर भीगे 
ढोलों और अल्हैतों के !

रुक जाऊंगा, तुम कहते हो 
तो मैं निश्चित रुक जाऊंगा
हाँ, मैं निश्चित रुक जाऊंगा
जब भी वह दिन आ जाएगा
जाने वह दिन कब आएगा !
अभी जरा जल्दी में हूँ मैं  
अभी मित्र मैं चलता हूँ.



Tuesday, June 14, 2011

आँखें

स्वप्न भरी सपनीली आँखें
पिघला अंतस गीली आँखें

मन के भावों की दर्पण हैं
भाव भरी चमकीली आँखें

माँ के आँचल  की छाँव तले
वे खुले अधर गर्वीली आँखें

किसी राम का इंतज़ार है
राह  तकें   पथरीली आँखें

चौखट पर  अगवानी करतीं
शबनम-सी शर्मीली आँखें

फिर आँखों से बात करेंगी
अधरों  वाली नीली आँखें

शाम की दुल्हन गेसू खोले
मय के बिना नशीली आँखें

जिस्म अगर दरिया है तो फिर
लहर कोई लहरीली आँखें

टूट रहे संबंधों का युग
रिश्तों-सी बर्फीली आँखें

स्वप्न देखती हैं उधार के
भूखी-प्यासी-पीली आँखें




Friday, June 10, 2011

...बो दिए हैं

बो दिए हैं
इस बरस
बरसात से पहले कहीं
सबकी नज़र से दूर
छिछली पोखरी के पास
मैंने आम  के दो बीज

अंकुरित होंगे कभी जब
आँख खोलेगा अनंत
फूट निकलेगी नदी
अनजान ऊर्जा से भरी
जैसे कि फूटा मन
तुम्हारा साथ पाकर मीत

मन में उठ रही है बात
आधी रात
जब अठखेलियाँ करने लगा है चाँद
जल में पोखरी के
रह गयी है पास मेरे
प्रिय तुम्हारी चीज

आम का हो बीज
या कि प्रिय तुम्हारी चीज
दोनों ही मुझे करते
कहीं भीतर बहुत परिपूर्ण
जैसे भर गयी जल से लबालब
पोखरी बरसात में.





Tuesday, May 17, 2011

छूटना अपनी ज़मीन से...

छूटना हमेशा ट्रेन की तरह नहीं होता
दौड़ते-दौड़ते, भागते-भागते
पटरी-दर-पटरी, सिग्नल-दर-सिग्नल
बदहवास
सब छोड़ देने की कोशिश में.

छूटना हमेशा केंचुल की तरह भी नहीं होता
धीरे-धीरे, रेंगते-रेंगते, सरकते
कुछ फर्क नहीं पड़ता जिससे
नयी-पुरानी खाल साथ-साथ
एक-दुसरे से जुड़ी-जुड़ी
लिथड़ती-लिथड़ती

छूटना केवल छूटने-सा होता है
जब डूब जाती है ज़मीन
डूब जाता है हौंसला
डूब जाती है अपने होने की हनक
बाँध की बढती ऊंचाई में
पानी के पसरते आयतन में
और मॉल की चकाचौंध रौशनी में

जब गर्दन पर रखा हो
भारी-भरकम पैर
और कहा जाता हो
साँस लो जोर से
और जोर से हँसते हुए
दूर टंगे मुआवज़े के
ऑक्सीजन सिलिंडर को देखकर
तब आप ही कहें
छूटना कैसा होता है
अपनी ज़मीन से...






Monday, May 9, 2011

ताल वहीँ से ठोंकी जानी है

ये दुनिया है बाबा
दो दिन का मेला है
सब पेट का खेला है

मदारी है, जमूरा है, बन्दर है
मदारी का खेल है
और खेल मदारी के अन्दर है
या फिर
मदारी खेल के अन्दर है

डुगडुगी बजाता है
हाथ हिलाता है
हवा में पैसा बनाता है
आता-जाता आदमी रुक जाता है
बहुत बार देखा खेल भी 
नया नज़र आता है.

नज़रबंदी का तमाशा है
जो है वह दीखता नहीं
जो दीखता है वह है नहीं
यह बात मदारी जानता है
जमूरा भी जानता है
नहीं जानता है तो बस बन्दर.

छोड़िए, कविता का क्या है
जैसी  भी हो, हो जाएगी
पर एक बात नयी-नयी-सी हुई है
बन्दर पूछ रहा है
पता जंतर-मंतर का
कहता है ताल वहीँ से ठोंकी जानी  है.

Wednesday, May 4, 2011

धूप...

अमलताश के वृक्षों से छन धरती पर छितराई धूप
जाने किसके पग की पायल किसकी है शहनाई धूप

अगली-पिछली सारी बातें अपने सारे सुख और दुःख
कह लो सब कहनी-अनकहनी सबकी सुनने आई धूप

रस्ते-रस्ते आंसू बोया विपदाओं की काटी फ़स्ल
नम आँखों की भाषा पढकर चेहरों पर पथराई धूप

कितनी अच्छी  लगती है जब सो जाती है कोई रात
रात की बातें सोच-सोचकर खुद से भी शरमाई धूप

बादल के संग आँख-मिचोली सूरज से आँखों में बात
मेरे जैसा कौन यहाँ पर फिरती है इतराई धूप

सपने मेरे आँखें तेरी चल सब कुछ यूँ बांटें हम
पनघट पीपल मंदिर पोखर सबसे यूँ कह आई धूप.




Friday, April 22, 2011

तुम्हारे बिन अकेला तो हूँ.......

अक्सर चुपचाप सांझ के धुंधलके में
जोर से लेता हूँ सांस
हवा की महक बता देती है
तुम्हे छुआ है उसने

एक-एक कर टूटते पत्ते 
गिरते हैं धरती के आँचल पर आहिस्ता 
रात कदम-दर-कदम  चलती 
आती है ओढ़े ख़ामोशी 
और मुझे कभी तुम दीखती हो 
कभी सूरज की बुझती-सी लाली

कभी लगता है चुपचाप छू लूँ सरकता दिन  
कभी चूम लूँ सूरज की ललछौही किरण
कभी खोल दूँ कसकता पुरातन मन 
अपने ही सामने एकाएक 
और अचकचा कर ले बैठूं तुम्हारा नाम 

किसी मस्जिद से उभरती अजान 
किसी मंदिर से फूटता आरती का स्वर
शायद तुम्हीं ने कुछ कहा है 
दिशाओं को सुनाकर.
दूर किसी घाटी से उठता धुआँ 
बढ़ता है ऊपर छूने आकाश 
या है मन का ही कोई नाज़ुक-सा ख्याल 
झरनों की कलकल -झरझर है या फिर 
उमगते मन का मासूम सवाल

मैं जान नहीं पाता
कुछ भी पहचान नहीं पाता
कुछ ऐसे ही जैसे
झप से गुजर जाए कोई उड़ता पाखी
झम से बिखर जाए कोई सांवला बादल
या फिर
आते-आते रह जाए होठों  पर
गीत गोविन्द की एक पंक्ति 

तुम्हारे बिन अकेला तो हूँ
पर तुम हो 
कहीं  दूर ही सही , एहसास भी है .




Wednesday, April 13, 2011

पाखी वाला गीत

पाखी वाला गीत अकेले जब-जब गाया
आकुल मन की विह्वलता में तुमको पाया

 नाव किनारे से ज्यों छूटी 
टूटी नींद नदी के जल की 
हलकी-हलकी लाल किरण का 
आँचल ओढ़े संध्या ढलकी 
बनती-मिटती लहरें मन की प्रतिच्छाया  .

बूढ़ा सूरज चलकर दिनभर 
किरणों की गठरी कंधे पर
धीरे-धीरे पार क्षितिज के 
लौट रहा थककर अपने घर 
सुबह का भूला भटका, शाम हुई  घर आया .  

Monday, April 11, 2011

अब न आदत रही....

अब न आदत रही गुनगुनाने की वह
मुझसे लिखने का सारा हुनर ले गयी 
कल झुका कर नज़र रो पड़ी  और फिर
मेरे सपनों की पूरी उमर ले गयी  

     उसने वादे किये मुझसे झूठे अगर 
     उसकी अपनी रही होंगी मजबूरियां 
     कौन चाहेगा ऐसे भला उम्र भर 
     ढोते रहना कसक टीस बेचैनियाँ

वह बुरी  तो नहीं थी  मगर भूल से
एक मासूम पंछी के पर ले गयी 

     हर कोई चाहता है सुखी ज़िन्दगी 
     चाह उसने भी की कुछ गलत तो नहीं
     बात चुनने की थी सो चुना बुद्धि से  
     प्यार बदले ख़ुशी कुछ गलत तो नहीं

और भी थे चयन के लिए रास्ते
किन्तु बेचैनियों का सफ़र ले गयी 

     कसके मुट्ठी में बाँधी हुई रौशनी 
     राह रोशन करे यह जरूरी नहीं
     देश का था ये विस्तार जो नप गया
     पाँव नापे जिसे मन की दूरी नहीं 

टिमटिमाते दियों की मधुर आस पर
वह अँधेरे सभी अपने घर ले गयी .

Saturday, March 26, 2011

साम्राज्यवाद बदनाम शब्द है

तुमने तय किया --
कृण्वन्तो विश्वमार्यम 
और चल दिए थामे  वल्गाएँ
श्वेत, सुपुष्ट अश्वों की
घाटियों-शिखरों-दर्रों के पार
ढूँढने मानव-बस्तियां
बनाने को उन्हें श्रेष्ठ !

अथाह जल-भरी सदानीराएं
मैदान अकूत अन्न-धन से भरे
नहीं थे , नहीं ही थे दृष्टि में तुम्हारी
बर्बर, लोलुप आक्रांताओ !
मान लेने को जी करता है
जोर पर तलवार के नहीं
सदाशयता से तुम्हारी
फैली करुणा और ज्ञान की रोशनी
अंधकूप में पडी असभ्यताओं तक !

बरसों-दशकों-सहस्राब्दियों...
जारी है अनवरत खेल
तुम तय करते हो
मुक्त करना है किसे और कितना 
कब और कैसे भी तुम्हीं   तय करते हो.

धरती की कोख से खोदने के बाद काला सोना 
खदानें  भर दे जाती हैं रेत से
तुम निचोड़कर हमारी स्थानीयता
खालीपन को पूरते हो अपने जैसा-पन से

इस हद तक जुनून है
दुनिया को सभ्य करते जाने का 
लोकतंत्र पहुंचाते हो तुम मिसाइलों पर लादकर 

बर्दाश्त  कर  पाना  कठिन  है
अपने से अलग भी  कुछ  है जो विशिष्ट  है
 जो अपने से अलग है   असभ्य है
जो अपने से अलग है  निर्दयी है
जो अपने से अलग है  कूढ़मगज है 
जो अपने से अलग है   आततायी है
जो अपने से अलग है   अंधकार में है

कृण्वन्तो विश्वमार्यम 
साम्राज्यवाद बदनाम शब्द है.


Wednesday, March 23, 2011

आम की खामोशी

मन ख़ास का होता है
तुम आम ठहरे
ऐसा कैसे कर सकते हो 
बौराए नहीं इस बार !
इस बार फूले नहीं फलने की उम्मीद में !

ऐसा भी कहीं होता है 
कि मन नहीं हुआ तुम्हारा 
और तुम नहीं फूटे बौर बनकर 

बौर का फूटना मन की मौज भर नहीं है 
किसी उम्मीद के लिए जीने का सबूत है
मोर्चा है खतरनाक बासंती चुप्पियों के खिलाफ 

आम तुम्हारी ख़ामोशी उतनी आम नहीं 
राडिया-कलमाडियों के नाजायज़ समय में.


Thursday, March 17, 2011

मन मछेरा

फेंकता है जाल
बटोर लाता है तुम्हारी यादें
मन मछेरा रोज़ रात
रोज़ रात जागती है आँख 
आँख में जागते हैं दिन तुम्हारे प्यार के.

भीगती है ओस 
रात कसमसाती है
बात कुछ होती नहीं है
उनींदी चादरों की सलवटें
कुछ अचकचायी देखती हैं
देखती हैं धर गया है कौन
बीते दिन तुम्हारे प्यार के.

मन मछेरे 
कल सवेरे
फूटती होगी किरण उम्मीद की जब
ओस को करके विदा चुपचाप
दिन चढ़ने लगेगा
हम चलेंगे दूर सागर में 
हवा के पाल पर
ढूँढने अपने पुराने दिन किसी के प्यार के.


Monday, March 14, 2011

ये दुनिया उतनी ख़राब भी नहीं हुई है

ये दुनिया उतनी ख़राब भी नहीं हुई है
आप सोचते हैं जितनी
स्कूल गए बच्चे लौट आते हैं घर, अधिकतर
रोटियां रखती हैं टिफिन में पत्नियां अब भी
अब भी छोले की ठेली लगती है आफिस के बाहर
पगार का इंतज़ार वैसा ही है
वैसा ही झुकता है सिर सांझ को बत्ती जलाकर

उदास मौसम में भी खिलते हैं कुछ फूल
धूल के पार रोशनी का यकीन बाकी है अभी
बाकी है अभी मधुमक्खियों के छत्तों में शहद
उन्हें तोड़ने का हौसला भी
चोट लगने पर निकलती है अभी चीख
जीभ अब भी काम आती है बोलने के

लोकतंत्र लाठी पर जूते-सा टंगा ज़रूर है
पर हुज़ूर के पांवों में शुगरजनित गैंग्रीन  है
और लाठियों में टूटने का डर
तहरीर चौक इसी दुनिया की चीज है
ये दुनिया उतनी ख़राब भी नहीं हुई है
जितनी सोचते हैं आप.

Friday, February 25, 2011

सो जा री सो जा राजदुलारी !

चाँद का खिलौना है सांझ की अटारी
खेलेगी झूम-झूम बिटिया हमारी
सो जा री सो जा राजदुलारी

नींद दूर रहती है परियों के देश
जा ले जा पुरवा री जल्दी सन्देश
देर करे काहे तू जल्दी से जा री
बिटिया की अंखियों में नींद की खुमारी
सो जा री सो जा राजदुलारी

चांदी-सी चांदनी फूल-सा बिछोना
मोती-सी अंखियों में सोने-सा सपना
आयेगी निंदिया चढ़ गीत की सवारी
बिटिया की अंखियों में नींद की खुमारी
सो जा री सो जा राजदुलारी

नाना की सोनजुही नानी की मैना
दादी के नयनों की दिन और रैना
बाबा की गीत ग़ज़ल छंद कविता री
बिटिया की अंखियों में नींद की खुमारी
सो जा री सो जा राजदुलारी .

Sunday, February 20, 2011

ज़िन्दगी

वक़्त की आँधियों में पली ज़िन्दगी
राह  काँटों की हरदम चली ज़िन्दगी
स्वप्न देखे अमरता के लाखों मगर
धूप के साथ हर दिन ढली ज़िन्दगी

     आँख आंसू भरी होंठ हँसते रहे
     उम्र बढती रही पाश कसते रहे
     एक एहसास ख़ाली हथेली का और
     दौड़ में हासिलों के हम फंसते रहे

हर घड़ी एक मुखौटा लगाये रही
नाटकों की तरह हो चली ज़िन्दगी

     एक सुहानी सुबह की सुखद आस ले
     धुंधली राहों का धुंधला-सा एहसास ले
    रोज़ बढ़ते रहे हम कदम-दर-कदम
    और बढ़ते रहे हर कदम फासले

राह मंजिल हुई साथ चलती रही
और क्षितिज ने हमेशा छली ज़िन्दगी

     एक नदी की रवानी कदम में लिए
     उम्र भर हम किनारों के जैसे जिए
     लाख चाहा कि लहरों को बांधें मगर
     एक छुवन को भी ताउम्र तरसा किये

बांधते छोड़ते कट गयी यह  उमर
और कितना जिए मनचली ज़िन्दगी.





Thursday, February 10, 2011

...अचीन्हे नयन

तुम न देखो मुझे यूँ  अचीन्हे नयन
मैं स्वयं के लिए शाप हो जाऊँगा
मैं तुम्हारे लिए पुण्य करता रहा
आज टूटा अगर, पाप हो जाऊँगा

     नाम जिसको कभी कोई दे न सका
     नेह से भी बड़ा एक नाता रहा
     बंध तोड़े सभी मैंने अनुबंध के
     और प्रतारण नमित-शीश पाता रहा

मौन मन की न खोलीं अगर गुत्थियाँ
पीर के मन्त्र का जाप हो जाऊँगा

     अब भी बाकी बहुत कुछ रहा अविजित
     मेरे जीवन के दुर्धर्ष संघर्ष में
     देह के दायरे टूट पाए नहीं
     सारे उत्कर्ष में सारे अपकर्ष में

तुमसे कहकर हृदय की समूची व्यथा
आज मैं रिक्त-संताप हो जाऊँगा.

Sunday, February 6, 2011

कुछ और दोहे

बेटी की डोली उठी  सूना आंगन-द्वार
पीपल रोया रो पड़ा  बूढ़ा हरसिंगार .

दोपहरी थी कर रही  पनघट पर विश्राम
आँचल पर तब लिख गया फागुन अपना नाम.

तन मेरा फागुन हुआ  मन मेरा आषाढ़
बंधन टूटे देह के  ऐसी आई बाढ़ .

संध्या बैठी घाट पर  थककर श्रम से चूर
नटखट सूरज मांग में  भरने लगा सिँदूर .

पनघट से कल कह गयी  पायल मन की बात-
ख़त आया परदेश से  जागी सारी रात.

इन्सां कैसे मर सके  ढूंढ  रहे तरकीब
कंकरीट से त्रस्त है  मिट्टी की तहजीब .

Monday, January 31, 2011

दिन निकला

लो !
फिर छू दिया
सूरज की पहली किरण ने
धरती के आँचल का छोर
पोर-पोर भीग उठा
बूंदों से अर्घ्य के
अर्घ्य, जो बटोरती है अंजुरियों में
कालिमा के ओर से लालिमा तलक
बीनती संवारती है बांटती है रात
चुन-चुनकर रखती है दूब की हथेलियों पर.
उचकेगी पंजों पर थोड़ी सी धूप
धीरे से छू देगी मंदिर की घंटियाँ
बरोहों से बरगद के सरकेगा दिन
और फैलेगा धरती के आँचल पर जी भर .

Tuesday, January 25, 2011

उम्र के उस पहर......

उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी

     पांखुरी-से ये दिन ये महक ये पवन
     अंजुरी में भरे अर्घ्य-सा मौन मन
     जब कभी उम्र के अजनबी मोड़ पर
     कह विदा छोड़ जायेंगे गीले नयन
और तनहा लगेगा ये जीवन-सफ़र
उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी.

     सांस के  तार पर स्नेह-धुन ज़िन्दगी
     ऊबकर हो उठेगी कभी बेसुरी
     यूँ लगेगा कि परिचित कसक-सी कहीं
     रह गयी है दबी कोंचती हर घड़ी
और देखेगी जब दूर उठती नज़र
उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी.

     जब मिलेंगे कभी अजनबी-से कहीं
     तुम कहोगी कि तुम अब तलक हो वही
     कोर पर होंठ के ले हंसी पोपली
     मैं कहूँगा कि तुम भी तो बदलीं नहीं
और घट जाएगी कई दशक यह उमर
उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी.

     कल कहीं दूर मैं कल कहीं दूर तुम
     भीड़ में ज़िन्दगी की रहें होके गुम
     वैसे आयें न चाहे कभी याद पर
     मौत जब जिस घड़ी आँख कर देगी नम
सांस का ख़त्म होने लगेगा सफ़र
उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी.

Tuesday, January 18, 2011

घर...

घर... कि दीवार से आगे भी बहुत कुछ है...
घर... कि आकार से आगे भी बहुत कुछ है...

     जिसके आँगन में हंसी बनके उतरती है किरन
     जिसकी सांकल के खटकने पे संवर जाते हैं मन
घर...कि उपहार से आगे भी बहुत कुछ है...

     जिसका  हर कण है किसी गीत का पावन स्वर
     'मैं' से आगे 'तुम' से पहले बीच में है घर
घर... कि अधिकार से आगे भी बहुत कुछ है

     घर की सांसों में सभी सबकी आँखों में है घर
     एक मंजिल जहाँ ठहरा थक के हर एक सफ़र
घर...कि व्यापार से आगे भी बहुत कुछ है...

घर... कि दीवार से आगे भी बहुत कुछ है...
घर... कि आकार से आगे भी बहुत कुछ है...

Saturday, January 15, 2011

कैसे कह दूँ , मीत !

कैसे कह दूँ , मीत ! मुझे अब तुमसे प्यार नहीं है

जिन अधरों पर मेरी बातें
जिस जिह्वा पर मेरा नाम
जिन पलकों में सुबहें मेरी
जिन केशों में मेरी शाम
जिस पर था कल , आज कहीं मेरा अधिकार नहीं है

संग-संग चलना मौन सड़क पर
आँखों से कह देनी बात
अपने सारे साझे सपने
जो देखे थे हमने साथ
अब भी हैं मौजूद कहीं पर वह आकार नहीं है

टुकड़ा-टुकड़ा जी लेने को
कैसे दूं जीवन का नाम
खींच रही है नियति नटी हर
पल-छीन डोरी आठों याम
टिका सके जो चार चरण कोई आधार नहीं है.

Tuesday, January 4, 2011

गुनाह की कविता

देह की वेदिका पर हवन हो गयीं
प्रेम के वेद की संहिताएं सभी
वासना के पुरोहित ने ऐसे पढ़ीं
स्नेह-सम्बन्ध की शुभ ऋचाएं सभी
    मूँद कर आँख सौंपा था विश्वास-धन
    अंजुरी में भरे अर्घ्य-सा मौन मन
    देहरी पर धरे दीप की भाँति लय
    कर दिए थे नयन में कुंवारे नयन
मोह आविष्ट स्वर की सजी आरती
और अपावन हुईं वर्तिकाएँ सभी
     देह की देहरी से बांधे प्रान क्यों
     केंद्र से इस परिधि के हैं अनजान क्यों
     जो युगों का है नाता तुम्हारा-मेरा
     फिर ये उथली-अधूरी-सी पहचान  क्यों
किसलिए काम ने कस लिया पाश में
और पापी हुईं कामनाएं सभी.