Saturday, January 15, 2011

कैसे कह दूँ , मीत !

कैसे कह दूँ , मीत ! मुझे अब तुमसे प्यार नहीं है

जिन अधरों पर मेरी बातें
जिस जिह्वा पर मेरा नाम
जिन पलकों में सुबहें मेरी
जिन केशों में मेरी शाम
जिस पर था कल , आज कहीं मेरा अधिकार नहीं है

संग-संग चलना मौन सड़क पर
आँखों से कह देनी बात
अपने सारे साझे सपने
जो देखे थे हमने साथ
अब भी हैं मौजूद कहीं पर वह आकार नहीं है

टुकड़ा-टुकड़ा जी लेने को
कैसे दूं जीवन का नाम
खींच रही है नियति नटी हर
पल-छीन डोरी आठों याम
टिका सके जो चार चरण कोई आधार नहीं है.

6 comments:

  1. जिस पर था कल,आज कहीं मेरा अधिकार नहीं है
    कैसे कह दूँ.......

    ReplyDelete
  2. बहुत मुश्किल है ये कह पाना, वैसे कहने की नौबत ही नहीं आती।

    ReplyDelete
  3. प्रिय,

    भारतीय ब्लॉग अग्रीगेटरों की दुर्दशा को देखते हुए, हमने एक ब्लॉग अग्रीगेटर बनाया है| आप अपना ब्लॉग सम्मिलित कर के इसके विकास में योगदान दें - धन्यवाद|

    अपना ब्लॉग, हिन्दी ब्लॉग अग्रीगेटर
    अपना खाता बनाएँ
    अपना ब्लॉग सम्मिलित करने के लिए यहाँ क्लिक करें

    ReplyDelete
  4. उन्हीं रास्तों पे जिनपे, कभी तुम थे साथ मेरे,
    उन्हीं रास्तों ए पूछा, तेरा हमसफर कहाँ है!
    .
    सुंदर गीत!!

    ReplyDelete
  5. इस कविता की समझ और व्याख्या के लिए कतिपय संकेत शब्द -

    गृह विरह ,संशय ,नैराश्य ,असमंजस ,अतीतजीविता...

    आईये बाहर आईये ...बसंत आ पहुंचा है!

    ReplyDelete