Monday, January 31, 2011

दिन निकला

लो !
फिर छू दिया
सूरज की पहली किरण ने
धरती के आँचल का छोर
पोर-पोर भीग उठा
बूंदों से अर्घ्य के
अर्घ्य, जो बटोरती है अंजुरियों में
कालिमा के ओर से लालिमा तलक
बीनती संवारती है बांटती है रात
चुन-चुनकर रखती है दूब की हथेलियों पर.
उचकेगी पंजों पर थोड़ी सी धूप
धीरे से छू देगी मंदिर की घंटियाँ
बरोहों से बरगद के सरकेगा दिन
और फैलेगा धरती के आँचल पर जी भर .

5 comments:

  1. बहुत खूब, प्रोफ़ैसर साहब। किशोर दादा का गाना याद आ गया, ’आ चल के तुझे’ - दिव्य अनुभूति सी हुई आज तो।

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  2. ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है.
    ये कौन चित्रकार है!

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  3. बरोहों से बरगद के सरकेगा दिन
    और फैलेगा धरती के आँचल पर जी भर
    अतिसुन्दर भावाव्यक्ति , बधाई के पात्र है

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  4. शब्दों का सुबह से शाम का सफ़र ...
    मंदिर में बजती घंटियों या कोयल की कूक -सा !

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