Monday, January 31, 2011

दिन निकला

लो !
फिर छू दिया
सूरज की पहली किरण ने
धरती के आँचल का छोर
पोर-पोर भीग उठा
बूंदों से अर्घ्य के
अर्घ्य, जो बटोरती है अंजुरियों में
कालिमा के ओर से लालिमा तलक
बीनती संवारती है बांटती है रात
चुन-चुनकर रखती है दूब की हथेलियों पर.
उचकेगी पंजों पर थोड़ी सी धूप
धीरे से छू देगी मंदिर की घंटियाँ
बरोहों से बरगद के सरकेगा दिन
और फैलेगा धरती के आँचल पर जी भर .

Tuesday, January 25, 2011

उम्र के उस पहर......

उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी

     पांखुरी-से ये दिन ये महक ये पवन
     अंजुरी में भरे अर्घ्य-सा मौन मन
     जब कभी उम्र के अजनबी मोड़ पर
     कह विदा छोड़ जायेंगे गीले नयन
और तनहा लगेगा ये जीवन-सफ़र
उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी.

     सांस के  तार पर स्नेह-धुन ज़िन्दगी
     ऊबकर हो उठेगी कभी बेसुरी
     यूँ लगेगा कि परिचित कसक-सी कहीं
     रह गयी है दबी कोंचती हर घड़ी
और देखेगी जब दूर उठती नज़र
उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी.

     जब मिलेंगे कभी अजनबी-से कहीं
     तुम कहोगी कि तुम अब तलक हो वही
     कोर पर होंठ के ले हंसी पोपली
     मैं कहूँगा कि तुम भी तो बदलीं नहीं
और घट जाएगी कई दशक यह उमर
उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी.

     कल कहीं दूर मैं कल कहीं दूर तुम
     भीड़ में ज़िन्दगी की रहें होके गुम
     वैसे आयें न चाहे कभी याद पर
     मौत जब जिस घड़ी आँख कर देगी नम
सांस का ख़त्म होने लगेगा सफ़र
उम्र के उस पहर फिर यही रहगुजर
याद आएगी हम तुम मिले थे कभी.

Tuesday, January 18, 2011

घर...

घर... कि दीवार से आगे भी बहुत कुछ है...
घर... कि आकार से आगे भी बहुत कुछ है...

     जिसके आँगन में हंसी बनके उतरती है किरन
     जिसकी सांकल के खटकने पे संवर जाते हैं मन
घर...कि उपहार से आगे भी बहुत कुछ है...

     जिसका  हर कण है किसी गीत का पावन स्वर
     'मैं' से आगे 'तुम' से पहले बीच में है घर
घर... कि अधिकार से आगे भी बहुत कुछ है

     घर की सांसों में सभी सबकी आँखों में है घर
     एक मंजिल जहाँ ठहरा थक के हर एक सफ़र
घर...कि व्यापार से आगे भी बहुत कुछ है...

घर... कि दीवार से आगे भी बहुत कुछ है...
घर... कि आकार से आगे भी बहुत कुछ है...

Saturday, January 15, 2011

कैसे कह दूँ , मीत !

कैसे कह दूँ , मीत ! मुझे अब तुमसे प्यार नहीं है

जिन अधरों पर मेरी बातें
जिस जिह्वा पर मेरा नाम
जिन पलकों में सुबहें मेरी
जिन केशों में मेरी शाम
जिस पर था कल , आज कहीं मेरा अधिकार नहीं है

संग-संग चलना मौन सड़क पर
आँखों से कह देनी बात
अपने सारे साझे सपने
जो देखे थे हमने साथ
अब भी हैं मौजूद कहीं पर वह आकार नहीं है

टुकड़ा-टुकड़ा जी लेने को
कैसे दूं जीवन का नाम
खींच रही है नियति नटी हर
पल-छीन डोरी आठों याम
टिका सके जो चार चरण कोई आधार नहीं है.

Tuesday, January 4, 2011

गुनाह की कविता

देह की वेदिका पर हवन हो गयीं
प्रेम के वेद की संहिताएं सभी
वासना के पुरोहित ने ऐसे पढ़ीं
स्नेह-सम्बन्ध की शुभ ऋचाएं सभी
    मूँद कर आँख सौंपा था विश्वास-धन
    अंजुरी में भरे अर्घ्य-सा मौन मन
    देहरी पर धरे दीप की भाँति लय
    कर दिए थे नयन में कुंवारे नयन
मोह आविष्ट स्वर की सजी आरती
और अपावन हुईं वर्तिकाएँ सभी
     देह की देहरी से बांधे प्रान क्यों
     केंद्र से इस परिधि के हैं अनजान क्यों
     जो युगों का है नाता तुम्हारा-मेरा
     फिर ये उथली-अधूरी-सी पहचान  क्यों
किसलिए काम ने कस लिया पाश में
और पापी हुईं कामनाएं सभी.