Sunday, July 21, 2013

दंतचियार ग़ज़ल

पत्थर पर सिर मारे जा
मन की खीझ उतारे जा

चुनने तक ही हक था तेरा
अब तो दांत चियारे जा

अपनी-अपनी ढपली सबकी
अपने राग उचारे जा

अंधी पीसे कुत्ता खाए
संसद के गलियारे जा

बहती गंगा डुबकी लेले
चैन से डंडी मारे जा

रामसनेही नाम रखा ले
सबकी खाल उतारे जा .

7 comments:

  1. पत्थर पर सिर मारे जा
    मन की खीज उतारे जा...वाह 'नावक के तीर' ऐसे ही होते होगे । बेहद सहज सटीक और और प्रभावी उद्गार ..।

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  2. अच्छी दांत चियारा रचना है :-)

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  3. प्रिय ब्लागर
    आपको जानकर अति हर्ष होगा कि एक नये ब्लाग संकलक / रीडर का शुभारंभ किया गया है और उसमें आपका ब्लाग भी शामिल किया गया है । कृपया एक बार जांच लें कि आपका ब्लाग सही श्रेणी में है अथवा नही और यदि आपके एक से ज्यादा ब्लाग हैं तो अन्य ब्लाग्स के बारे में वेबसाइट पर जाकर सूचना दे सकते हैं

    welcome to Hindi blog reader

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