Friday, February 26, 2010

लड़कियाँ

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ये लड़कियाँ पहाड़ की
          ये लड़कियाँ पहाड़ की
ये मन की अपने मन रखें
नयन की बस नयन रखें
हृदय की पीर तीर-सी
करके हर जतन रखें
नदी-सी मनचली,खिलीं
        ज्यों डोलियाँ बहार की.
उगें तो धूप-सी उगें
ढलें तो सांझ-सी ढलें
उमर को गूँथ चोटियों
चलें तो राग-सी चलें
ये झील-सी बंधी-बंधी
           औ मुक्त हैं बयार-सी.
स्वभाव बर्फ-सा कड़ा
जो प्रेम पा पिघल पड़ा
सजें तो ज्यों बनी-ठनी
औ सादगी तो कांगड़ा
ये कवि की प्रेम-कल्पना
          कलम हैं चित्रकार की.   


 

6 comments:

  1. आप और आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ...nice

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  2. Khoobsoorat rachana...holi mubarak ho!

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  3. अच्छा लिखा है, होली की शुभकामनायें

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  4. गांवो की जो बात
    बातो की है रात
    रातो के है सपने
    सपनों में गांव

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  5. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

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  6. @ उगें तो धूप-सी उगें
    ढलें तो सांझ-सी ढलें
    उमर को गूँथ चोटियों
    चलें तो राग-सी चलें
    ये झील-सी बंधी-बंधी
    औ मुक्त हैं बयार-सी.

    वो गाना है न "ये कौन चित्रकार है?" जाने क्यूँ याद आ गया। क्या इसे उसी धुन पर गाया जा सकता है ?

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