Sunday, February 2, 2014

कुकुरमुत्ते

उग गए हैं ढेर सारे कुकुरमुत्ते
घर के नाबदान पर
छत्ते के छत्ते

सोचता हूँ क्या करूँ इनका
फ़ेंक दूँ उखाड़कर
या फिर छोड़ दूँ यों ही
हो जाने के लिए विनष्ट
एक दिन चुपचाप अपने-आप
बिखर जाएँगे होकर चिंदी-चिंदी
न बचेगा कुछ भी निशान
जैसे कि बच जाता है
कुछ-न-कुछ हर लहलहाते पेड़ का

कुछ-न-कुछ बच जाने का
लिखा गया है अब तक जो भी इतिहास
चटख चमकीला सजीला है
उसका चटख रंग
पर सूरज की रौशनी का बंधुआ है

भर जाएँ सब पन्ने-के-पन्ने विरुदगाथाओं से
न रहे जगह कहीं भी तिलभर
किसी और के लिए
फिर भी ढूंढ ही लेंगे अपनी जगह
कहीं-न-कहीं हाशिए में ही सही कुकुरमुत्ते
और फिर बदल देंगे एकदिन
इतिहास की हर इबारत का अर्थ

नहीं होती है जरुरी चकाचौंध सूरज की
वे जानते हैं जीना प्रभामंडल के बिना भी
और यह बात
औरों से अधिक मालूम है
मुस्कुराते कुकुरमुत्तों को .
 


Sunday, July 21, 2013

दंतचियार ग़ज़ल

पत्थर पर सिर मारे जा
मन की खीझ उतारे जा

चुनने तक ही हक था तेरा
अब तो दांत चियारे जा

अपनी-अपनी ढपली सबकी
अपने राग उचारे जा

अंधी पीसे कुत्ता खाए
संसद के गलियारे जा

बहती गंगा डुबकी लेले
चैन से डंडी मारे जा

रामसनेही नाम रखा ले
सबकी खाल उतारे जा .

Sunday, July 14, 2013

मैं तुम्हारी राह में हूँ

रख दिया था जो कभी गीत-सा तुमने अधर पर
मैं उसी प्रतिदानपूरित स्नेह की फिर चाह में हूँ
मैं तुम्हारी राह में हूँ

मैं घरों में , मैं सड़क पर उम्र के इस मोड़ पर
देखता फिरता हूँ चेहरे जोड़कर कुछ तोड़कर
और फिर जाती निगाहों में वही तस्वीर जो
आरती की झिलमिलाती छाँह आया छोड़कर

फिर चले आए हैं पर्वत पार से उड़ते पखेरू
मैं भी ऐसे ही किसी की सांस में हूँ, आह में हूँ
मैं तुम्हारी राह में हूँ

मैं लकीरें खींचता हूँ बांधता आकार को मैं
शब्द गढ़ता हूँ अजाने अर्थ देता प्यार को मैं
रूप के इतिहास का खोजी रहा बरसों मगर
दे न पाया हूँ अभी तक एक कण संसार को मैं

दूर तक नाकामियों की रेत  भर फैली हुई है
पर नदीजल-सा उसी उम्मीद में, उत्साह में हूँ
मैं तुम्हारी राह में हूँ .   

Tuesday, July 2, 2013

केकयी के दो वरदान

वह युद्ध था अन्याय के
प्रतिरोध का प्रतिकार का
वह युद्ध दैवी-राक्षसी
प्रवृत्ति के वर्चस्व का
वह युद्ध विजयी और विजित
के पार भी जो व्याप्त था .
बस एक निर्णय
एक निर्णय ने बदल
डाली भविष्यत की दिशा .

रथचक्र की धुरी घिसी
रथ अनियंत्रित लडखडाया
लडखडाया विजयध्वज
श्लथ बन्ध कबरी का लिए
निज हस्त को धुरी किए
ली थाम ध्वजा धर्म की
केकेयसुता दशरथप्रिया ने
बस एक पल था, एक ही
निर्णय मरण-अमरत्व का
अस्तित्व की बाज़ी लगा
की मानरक्षा सूर्यकुल की

युद्ध बीता , जय देवों की
कृतज्ञ दशरथ ने कहा --मांगो प्रिये ,
कर शक्तिभर प्रयत्न , करूँगा पूरा
वर , मैं देवमित्र  रघुवंशी अजनन्दन .
सोचती हूँ कितना है मादक
भ्रम दाता होने का
कुछ-कुछ घृणित भी
सर्वस्व समर्पिता को लालच वरदान का
चुप हो रहना केकयी का
कुछ नहीं , कुछ भी नहीं
बस श्रेष्ठता के दंभ का रेखांकन भर
वह वर , दंभ श्रेष्ठता का
नकार नारी के प्रेममय बलिदान का
पा समय प्रस्फुटित हुआ
विषकंद-सा करने विषाक्त
अबोध मन जीवन अनेक
बस एक पल एक निर्णय
दे गया अनगिन व्यथाएं .

सुनती हूँ सास कहा करती हैं
मिहिरवंश में प्यार
एक हथियार सदा वंचित करने को
नैसर्गिक अधिकार समर्पण का नारिसुलभ
तोल दिया जाता वरदानों की निर्जीव तुला में .


(भरत की पत्नी मांडवी की नज़र से रामकथा लिखने की कोशिश की थी कभी)

Saturday, June 22, 2013

कैसा गीत सुनाऊं

तुम्हीं बताओ आज तुम्हें मैं कैसा गीत सुनाऊं
अपने मन की बात कहूँ या जग की रीत सुनाऊं

कुछ ऐसा जो हँसी बिखेरे या आंसू बरसाए
कुछ यौवन की रंगरलियाँ या फिर बचपन के साए
बीते दिन जो लाया करतीं किरणों वाली परियां
या आगत का अनजाना पल जिसने स्वप्न दिखाए

सब कुछ हार गया मैं जिसमें ऐसी जीत सुनाऊं

गाऊं मैं हेमंत शिशिर या सावन की बरसातें
जेठ की जलती दोपहरी या भादों वाली रातें
क्या वसंत की मादकता या धरती की अंगड़ाई
या फिर गीतों में मैं ढालूं फागुन वाली बातें

गिनने को जो दिन दे जाए ऐसी प्रीत सुनाऊं

इस दुनिया से दूर की बातें या जग की सच्चाई
भीड़ में खोया जीवन या कि मुट्ठी भर तन्हाई
संबंधों के बंधन या फिर आवारा आज़ादी
या वो आँचल तुम्हें सुनाऊं जिसमें धरा समाई

मुझको गीत बनाया जिसने वो मनमीत सुनाऊं
तुम्हीं बताओ आज तुम्हें मैं कैसा गीत सुनाऊं 

Friday, June 14, 2013

कुछ ग़ज़ल जैसा

धुएं  की लकीर हवा में ठहरती कब तक
ज़िन्दगी दौर से ऐसे गुजरती कब तक

सुबह छुपा क्यों न लेती कोहरे में मुंह
बर्फ-सी धूप में आखिर सिहरती कब तक

अँधेरा घिर गया ! घिरना था , क्या हुआ
पकी-सी धूप मुंडेरी पे ठहरती कब तक

एक तू ही नहीं राह में और भी थे कई
मंजिल तेरा इंतज़ार और करती कब तक

सो गयी थककर तुझे आंखों में लिए
कोई रात जुगनुओं से संवरती कब तक

आज खुल ही गयी आखिर अपनी हक़ीकत
हँसी उधार की चेहरे पे उतरती कब तक   

Tuesday, June 11, 2013

सखि ! तुमसे यह कैसा नाता !

सखि ! तुमसे यह कैसा नाता !

बादल बरसे धरती हरसे
पत्ता-पत्ता जीवन सरसे
तन मेरा भी भीगे लेकिन
मन पपिहे-सा टेर लगाता
सखि ! तुमसे यह कैसा नाता !

चंचल पलकें ढलकी अलकें
जिन अधरों से अमृत छलके
छू साँसों से अर्घ्य समर्पित
उनको देवि ! नहीं कर पाता
सखि ! तुमसे यह कैसा नाता !

पास बिठाऊँ गीत सुनाऊँ
मन की बातें कहता जाऊं
चाहा है कई बार मगर फिर
मौन न जाने क्यों रह जाता
सखि ! तुमसे यह कैसा नाता

नयन भिगोते आस पिरोते
संग तुम्हारे हँसते-रोते
दिन जीवन के कट जाते पर
स्वप्न भोर का मन कसकाता
सखि ! तुमसे यह कैसा नाता !

Sunday, March 24, 2013

हम नदी के द्वीप

हम नदी के द्वीप संग-संग
फिर भी कितनी दूर हैं

     बीच में जलधार निर्मल
     पद तले अविचल धरातल
     जोड़ता आकाश हमको
    शब्द टलमल चिर विकल

दूर हैं बस हाथ भर
जल-कमल के पात भर
साथ हैं मिलना नहीं
कुछ इस तरह मजबूर हैं

     तुम हँसे मैं चुप रहा
     दुःख मेरा तुम मौन हो
     दृष्टि में मोजूद लेकिन
     कौन जाने कौन हो

मन  अपरिचित तन अपरिचित
स्नेह-रीते प्रेम-वंचित
रिक्त अंचल रिक्तता का
धन लिए मगरूर हैं

     कौन जाने किसलिए यों
     रख गया ऐसे अलग
     चल न सकते पास आने
     के लिए हम एक पग

तुम बंधे मैं भी  बंधा                                                                                  
रज्जु ज्यों अपनी व्यथा
मुक्त होने की मगर हम
चाह से भरपूर हैं
हम नदी के द्वीप संग-संग
फिर भी कितनी दूर हैं .

Saturday, March 9, 2013

लतखोर टाइप का समय

लतखोर टाइप  का यह समय
सभ्य भाषा में नहीं लिखा जा सकता
मूत को मूत लिख देना
सौन्दर्यबोध का स्खलन हो सकता है
मगर मैं जानता हूँ उसकी बदबू
किसी भी दूसरे शब्द में देर तक नहीं रुक सकती

उपमेय उपमान उपमाएं सब शिथिल हैं
मर्दानगी के तमाम उपक्रमों के बावजूद
ओखली में धान की तरह कुटे शब्द
नहीं रह गए हैं उगने लायक

तुम जब भी कहते हो मेहनत
बाज़ार एनर्जी ड्रिंक चमकाता है
तुम कहते हो घाम 
छतरियों के रंग बिखेर दिए जाते हैं
मैं जानता हूँ तुम्हारे संघर्ष और धूप  कहने में
कही जाती है पसीने की गंध और रोटी और इज्ज़त
मगर समझा जाता है डेऑड़रेन्ट और सनस्क्रीन लोशन
यह शब्दों से संवेदनाओं के निकल जाने का समय है
यह बाज़ार के विस्तार का समय है .      

Friday, July 27, 2012

... उम्मीद होती भी बेहया है !

गहगहाकर फूला है गुलमोहर
भभक्क लाल
बंद पड़ी फैक्ट्री के भीतर
टूटकर लटकती एस्बेस्टस शीट्स की आड़ में

खुशी पगार से इतर भी होती है
अगर चिमनियों से उठ रहा हो धुँआ
करने भर को हो काम
और हिक भर हो उम्मीद कल की

चिमनियों से धुँआ रुकने के साथ
रुक जाती है आँख में सपनों की उड़ान
रुक जाती हैं बच्चों की पढाइयां
और दवाइयाँ भी बुजुर्गों की

ट्रकों पर लदते सामान के साथ
लदते हैं बच्चों के जन्मदिन , विवाह और याराने
सबसे निचले हिस्से में निश्चिंतताओं के बगल
अपूर्ण जिम्मेदारियों के ठीक नीचे
दबे-दबे दुबके-दुबके

बंद हुई फैक्ट्रियों में रह जाते हैं
खुले दरवाजे वाले खाली होते मकान
 मकानों पर चिपके एविक्शन नोटिस
और भीतर कमरे की सबसे अच्छी दीवार पर
हरे-लाल रिबन से लिखा हैप्पी बर्थडे

गहगहाकर फूला है गुलमोहर
लाल भभक्क
कि जिंदगी ढूंढ लेती है
मुस्कुराने के नए बहाने
और उम्मीद होती भी बहुत बेहया है !

Saturday, July 14, 2012

ईश्वर , मैं तुम्हारे पक्ष में खड़ा हूँ

मैं छानता हूँ कविताएं
जैसे छानती है माँ स्वेटर सलाई पर
अपने अजन्मे बच्चे के लिए

मैं कागज़ पर लिखता हूँ पहली पंक्ति
बिल्कुल पहली हराई की तरह
बीज बोने से पहले गीले खेत में

मैं अँगुलियों में घुमाता हूँ शब्द
अनामिका में पहनी पैती की तरह
पूजा के संकल्प से पहले

मैं रचता हूँ वह अचम्भा
ठहरा है ऋचाओं में जो श्वान बनकर
सदानीराओं के दर्शन मात्र से

मैं पूरा होना चाहता हूँ छोड़कर
कुछ अर्थगर्भी शब्द अंखुआते हुए
नम ज़मीन में
जहाँ बच रही है गर्मी

शब्द भर कविता , आँख भर पानी
सांस भर उम्मीद और मुट्ठी भर आसमान
किसके दिए मिलता है किसीको

अपनी सभी असहमतियों के साथ
ईश्वर , मैं तुम्हारे पक्ष में खड़ा हूँ  .



Monday, July 2, 2012

बरसो असाढ बरसो

बरसो असाढ़ बरसो
तुम धार-धार बरसो
तुम बार-बार बरसो
बरसो असाढ़ बरसो

बरसो कि प्यास बाकी
बरसो उजास बाकी
इस जिंदगी की जंग में
बरसो कि आस बाकी
     बरसो असाढ़ बरसो

बरसो कि प्यास भीजे
बिरहिन की आस भीजे
यह खडखडी दुपहरी
बीते और सांस भीजे
     बरसो असाढ़ बरसो

बरसो कि खेत भीजे
बरसो कि रेत भीजे
सब भूत-प्रेत भीजे
सब सेंत-मेंत भीजे
    बरसो असाढ़ बरसो

आँचल का कोर भीजे
बांहों का जोर भीजे
मन का अंजोर भीजे
सब पोर-पोर भीजे
     बरसो असाढ़ बरसो

काली का थान भीजे
छप्पर-मचान भीजे
बड़का मकान भीजे
सब आन-बान भीजे
     बरसो असाढ़ बरसो

आँगन-दुआर भीजे
पनघट-इनार भीजे
कुक्कुर-सियार भीजे
सब कार-बार भीजे
     बरसो असाढ़ बरसो

बरसो कि बाग भीजे
पोखर-तड़ाग भीजे
कजरी का राग भीजे
धनिया का भाग भीजे
     बरसो असाढ़ बरसो

बरसो कि सब बदल दो
बदलेगा तुम दखल दो
सब सड़ गए सरोवर
हँसते हुए  कमल दो
     बरसो असाढ़ बरसो .   

Monday, June 25, 2012

रोटियां

तवे से उतरती रोटियां
चली नहीं जाती हैं अपने-आप
वहां जहां कि होती है भूख

बहुत मायने रखता है
उन हाथों का हुनर
जो तय करते हैं
भूख से रोटी का रिश्ता
और अनुपात भी

रोटी केवल भूख के लिए नहीं होती
नहीं होती जैसे कि ज़मीन
केवल रहने के लिए
या कि नहीं होता पानी
केवल पानी भर बनकर
सबके लिए
ज़रूरतों से तय नहीं होते
संभावनाओं के समीकरण उलझे हुए

वे हमेशा देवता ही रहते हैं
जो छिपाकर रख लेते हैं आग
रोटियां औज़ार हैं
जिनसे खुलते हैं सत्ताओं के जटिल समीकरण
महत्वाकांक्षाओं की शतरंजी बिसात पर .

Friday, June 1, 2012

तुम्हारा लौटाता हूँ प्यार

चलो तुम भूल गए सर्वस्व
मगर इतना तो होगा याद
बढ़ाकर मैंने अपना हाथ
सजाया था माथे पर चाँद

झपकना पलकों का तुम भूल
देखती रही थीं मेरी ओर
हुई आँखों-आँखों में बात
और कस गयी स्नेह की डोर

तुम्हारे नयनों से संवाद
मिली मन को मन की सौगात
फिसलती जाए पकड़ी डोर
संभाले नहीं संभलता गात

चले थे दो ही पग हम साथ
हो गयीं अपनी राहें दूर
किया है तुमने तो स्वीकार
मुझे पर हो कैसे  मंजूर

दिया है तुमने तो दिल खोल
लिया ही गया न मुझसे भार
ह्रदय में कसके जो वह टीस
नयन को आंसू का उपहार

मेरे कंधे पर रखकर शीश
दिया था तुमने ही  अधिकार
अधर से लिख देने का मीत
तुम्हारे अधरों पर निज प्यार

नहीं माना तुमको है याद
किया था तुमने मुझसे प्यार
कभी भीगी आँखों की कोर
रचा था सपनों का संसार

मगर मैं कैसे जाऊं भूल
मेरे जो जीवन का आधार
जहाँ स्थित मेरा अस्तित्व
करूँ कैसे उससे इनकार

कथा जो रही अधूरी आज
करूँ पूरी वह मेरी चाह
छिपाए रख न सकूँ अब और
अधर के मुस्काने में आह

रहो खुश तुमको मेरे दोस्त
समर्पित है मेरा उपहार
विदा की घड़ी तुम्हें लो आज
तुम्हारा लौटाता हूँ प्यार .


Sunday, May 27, 2012

ये उदासियाँ

ये उदासियाँ भी मेरे ही हिस्से आनी थीं
कि जैसे आती है
रात भर जागी हुई आँखों में नींद
और गंधाते पानी में मछलियों को सांस
बस जी लेने भर

उदास होना जीवित होना है
रोज़मर्रा की लंगडी दौड में
कि खराब होना अब भी खराब है
और गलत बिलकुल उतना ही गलत
न ज्यादा न कम सांस भर

उदासी आइना है
और सबूत भी
जीवित होने का.

Thursday, April 5, 2012

इंतज़ार का गीत

रात भर चांदनी बस तुम्हारे लिए
जुगनुओं की सजाती रही अल्पना
बिन बुलाए नयन नीर लेकर मेरे
द्वार आता रहा दर्द का पाहुना

     चूड़ियों से भरे हाथ सूने हुए
     रात आई ढली दर्द दूने हुए
     सारे पुरवा के झोंके उदासी भरे
     वेदना के रुपहले नमूने हुए

दीप-सा रात भर कोई जलता रहा
और सिसकती रही रात भर साधना

     पायलों को कसकती कहानी मिली
     पीर होंठों को कोई अजानी मिली
     गुनगुनाए महावर जिसे उम्र भर
     इंतज़ारों की कविता पुरानी मिली

गंध-सा रात भर कोई छलता रहा
और भटकती रही रात भर कामना । 

Saturday, March 3, 2012

यह वाद की खटिया उठाने का समय है

पड़ गए हैं उतान मुद्रा में
वाद की खटिया बिछाकर
कुछ विकट संभावनाशील प्रबुद्ध विचारक
अटक गयी है वायु
विकारवश
सिद्धांतों की सतत जुगाली से ।

क्या करें किस रीति निकले
फँस गयी है फाँस-सी जो गले में
हूक भरते , खेचरी मुद्रा बनाते
तानते हैं पाँव धनु की तान-सी
फिर डोलते हैं
दोलकों की लय में जैसे ,
क्रोध , फिर दुत्कार, अब दयनीयता है ।

क्या करें,  लाएं कहाँ से सांचे
हो सके जिसमें कि फिट यह आदमी
यह आदमी जो बोलता है सच
यह आदमी जो दर्द को दर्द कहता है
यह आदमी जो भूख में भी मुस्कुराता है
यह आदमी जो बस आदमी है
निपट नितांत बेलाग बस आदमी

क्या करें इसका कि कुछ हम-सा दिखे
क्या करें इसका कि कुछ बदनाम हो
क्या करें इसका कि कुछ कमज़ोर हो
क्या करें इसका कि कुछ संतप्त हो
कि अब तक की सभी सीखी हुई तरकीब से
यह बंध न पाया है किसी सिद्धांत में

यह वाद के खांचे से बाहर है अगर
यह टिप्पणी है हर तरह के वाद पर
यह रिजेक्शन है हरेक उस वाद का
जिसके लिए इन्सान बस औजार है

अतः संभलो , परम प्रबुद्ध विचारक !
जुगाली फिर कभी करना तुम सिद्धांत की
अब दर्द की खातिर दवाई ढूंढ़नी है
ढूँढना है प्रात अँधेरी रात का
यह वाद की खटिया पुरानी हो गयी
यह वाद की खटिया उठाने का समय है ।

Monday, December 26, 2011

हुसैन के घोड़े

मैं समझना चाहता हूँ
तुम्हारे होने का मतलब
मैं उलझना चाहता हूँ
हर उस चीज से जो तुम तक जाती है
मैं पकड़ना चाहता हूँ
तुम्हारे सोचने के तरीके को
कि विवाद घूम-घूमकर
क्यूँ चले आते थे तुम तक
कि कोई पहचान तुमपर चिपकती क्यों नहीं थी
कि वह जगह किसने बेंच खाई
गुंजाइश थी जहाँ खड़े होकर बात करने की
कि दीवारों के आर-पार या तो घुटन है या शोर
या तो साजिशें हैं या फिर चीख

तर्क करने की नहीं डरने की चीज है अब
मैं जो सोचना भी चाहूँ तो डर लगता है---
कोई पढ़ रहा है मेरे विचार
और हो रहा है आहत !

हुसैन, अच्छा है तुम्हारे घोड़े बेलगाम हैं
वे नहीं जानते लोहे का स्वाद
और ये बात लुहारों को अखरनी ही चाहिए
कि उनके हथौड़े , आग और चोट पर
हर बार भारी पड़ जाते रहे तुम्हारे घोड़े ।

  

Wednesday, November 23, 2011

विदाई.... एक व्यक्तिगत कथा

कहीं छोड़ आया हूँ
अपनी एक प्यारी-सी चीज
शाम के धुंधलके में
कोहरा ओढ़े दूर जंगल में
लांघकर शहर, गाँव, पहाड़ , नदियाँ .
मन उदास है, गहरा उदास
मन चुप है, निहायत चुपचाप
दुःख हो , ऐसा नहीं लगता
दर्द है , कुछ-कुछ प्रिय-सा.


सर्पीली सड़कों से गुजरते हुए
सुनाता रहा पहाड़ी लड़की का गीत
बालों में घुमाते हुए उँगलियाँ
बांटता रहा अतीत के किस्से
हिस्से-हिस्से खोलता रहा
मन के तमाम बंद कमरे
दिखाता रहा कोने-अंतरे एक-एककर
पोर-पोर बींधती रही आकुल तृप्ति .


स्मृति के निर्झर झरते रहे कलकल
अविकल ऊँचाइयों  से उतरते
खुल गयीं सब गांठें मन की
और फैल गयी चांदनी रात
किरण-किरण चीड के पेड़ों पर
बात करते, बात सुनते .


देह तपी थी सोना हो गयी 
मन कांपा था अर्घ्य की तरह
संस्कार सब छीज गए
रीत गया बूँद-बूँदकर अहम्
बची रह गयी बस एक कसक
खालीपन से भरी-भरी .


नदियाँ-पहाड़-जंगल सब पार किये
पार किया केशों का गझिन आकर्षण
देह का दीप्त दरिया
मन का मोहक आकाश
और छोड़ आया
अपना  एक हिस्सा
कोहरा ओढ़े जंगल में.


वापसी को मुड़े कदम कांपे
कांपा कहीं भीतर विश्वास
स्वयं के मज़बूत होने का
हिलते हाथों संग हिला
अधिकार का महीन आवरण
और उग आयीं पीठ पर एक जोड़ी आँखें.





  

Thursday, October 27, 2011

हमारे प्रेम का शहर

न उस शहर मे अब तुम रहती हो
न उस शहर मे अब मै रहता हूँ

पर हम दोनो ही के पास है
अपने-अपने हिस्से का वह शहर
जो कहीँ भी बस जाता है
आपस मे बात करते ही.


यह और बात है कि
प्रेम करने से होने तक की खबर
क़त्ल की कहानियो के साथ छपती थी
हमारे शहर के अखबार मे
रास्ते किनारे पेड पर अटकी लाल रिबन-सी याद
हवाओ मे फडफडाती अब भी है
समय के साथ बदरंग होकर भी.


शहर बदलता है और लोग भी

गली-मोहल्लो-चौराहो की सूरत के साथ

मगर ज़िन्दा रहता है एक शहर
हमारे-तुम्हारे भीतर बचे प्रेम-सा

बिल्कुल वैसा ही मन के किसी कोने मे

जैसा देखा था हमने उसे एक-दूसरे के प्रेम मे.