__________________________________
सुनो अनु!
ऐसा क्यों होता है
तुम अपने लिए चुनती हो दिन
और रात मेरे हिस्से आती है .
एक अलसाई सुबह
तुमने चुना था प्रेम
मैं बेचैन हो उठा.
एक खड़ी दोपहर
तुमने चुना यथार्थ
मैं दिग्भ्रांत हो उठा.
फिर, आज इस ऊदी शाम
तुमने चुना है जीवन
मैं पथरा रहा हूँ.
सुनो अनु !
यह समर्पण , समझौता या सदाशयता नहीं
चयन का अधिकार है तुम्हारा
जिसे स्वीकार मैं करता हूँ .
Monday, May 31, 2010
Sunday, May 30, 2010
एक प्रेमगीत
देह बांची नित्य मैंने वेदमंत्रों की तरह पर
उपनिषद के ब्रह्म-सी तुम दूर ही होती रहीं
मैं अर्थ की गहराइयों से शब्द की सीमा तलक
भटका किया हर रोज लेकिन तुम सदा खोती रहीं.
देह ने जाना मगर बस देह को
संदेह ने जाना मगर संदेह को
यूँ तो हथेली भीग आयी नाम भर से
किन्तु जाना स्नेह ने ना स्नेह को
उम्र बीती मन से मन को जान पाने की ललक में
साँस , गति, पहचान , कोशिश व्यर्थ सब होती रहीं.
उपनिषद के ब्रह्म-सी तुम दूर ही होती रहीं
मैं अर्थ की गहराइयों से शब्द की सीमा तलक
भटका किया हर रोज लेकिन तुम सदा खोती रहीं.
देह ने जाना मगर बस देह को
संदेह ने जाना मगर संदेह को
यूँ तो हथेली भीग आयी नाम भर से
किन्तु जाना स्नेह ने ना स्नेह को
उम्र बीती मन से मन को जान पाने की ललक में
साँस , गति, पहचान , कोशिश व्यर्थ सब होती रहीं.
Thursday, May 27, 2010
औरतों के लिए एक ऋचा, पुरुषों की ओर से
तुमने कब कहा मुझसे
तुमको चाँद चाहिए
तब तो नहीं, जब
अंजलि में जल ले मैंने कहा-
कुछ भी मांग लो , मिलेगा .
तब तो तुमने यूँ ही नचाये
हीरे की कनी-से नैन
पलकें झपकाईं
और मेरे हाथ का जल ले लिया ,
शीश पर चढ़ाया , कहा ---
मैं संकल्प हूँ ,
तुमने किया है ,
कहो, किसको दोगे !
मैंने कहा -- समय को देता हूँ,
मैं तुम्हें समय को देता हूँ .
आज बरसों बाद
समय के पीछे चलते एकाकी
तुम्हें देखता हूँ--
तुम्हारे हाथों में चाँद है
छोटा-सा, नन्हा-सा, रुई के फाये-सा
बंद मुट्ठियों में समय बांधे.
सोचता हूँ
तुमने कब कहा
तुमको चाँद चाहिए....
..या...शायद ...कहा था
जब मौन ने बोलना नहीं सीखा था
और अलकें अभी संकल्प-जल भीगी हुई थीं ,
तुम देवी हो-- मैंने कहा था ,
तुम शक्ति हो , धरा हो ,
धारा हो करुणा की ,
स्नेह हो, पवित्रता हो--
यह सब मैंने कहा था.
और तब
हाँ, शायद तभी
तुमने कहा था --
मुझे चाँद चाहिए
मेरा अपना निजी चाँद.
तुमको चाँद चाहिए
तब तो नहीं, जब
अंजलि में जल ले मैंने कहा-
कुछ भी मांग लो , मिलेगा .
तब तो तुमने यूँ ही नचाये
हीरे की कनी-से नैन
पलकें झपकाईं
और मेरे हाथ का जल ले लिया ,
शीश पर चढ़ाया , कहा ---
मैं संकल्प हूँ ,
तुमने किया है ,
कहो, किसको दोगे !
मैंने कहा -- समय को देता हूँ,
मैं तुम्हें समय को देता हूँ .
आज बरसों बाद
समय के पीछे चलते एकाकी
तुम्हें देखता हूँ--
तुम्हारे हाथों में चाँद है
छोटा-सा, नन्हा-सा, रुई के फाये-सा
बंद मुट्ठियों में समय बांधे.
सोचता हूँ
तुमने कब कहा
तुमको चाँद चाहिए....
..या...शायद ...कहा था
जब मौन ने बोलना नहीं सीखा था
और अलकें अभी संकल्प-जल भीगी हुई थीं ,
तुम देवी हो-- मैंने कहा था ,
तुम शक्ति हो , धरा हो ,
धारा हो करुणा की ,
स्नेह हो, पवित्रता हो--
यह सब मैंने कहा था.
और तब
हाँ, शायद तभी
तुमने कहा था --
मुझे चाँद चाहिए
मेरा अपना निजी चाँद.
Sunday, May 16, 2010
हाशिया
अभी जितना कहा है
और उससे भी कम जितना लिखा है
और छोड़ दिया है
शब्द, वाक्य, अर्थ की पोटलियों में
इधर-उधर
मेज-किताब-अख़बार
सब कहीं भटकने के लिए
उससे कहीं ज्यादा- बहुत ज्यादा
रह गया है
टकने से-
किसी कमीज़ पर बटन बन,
छलकने से-
पवित्र अर्घ्य-सा अंजुरी से,
दहकने से-
भूख या प्यास की तरह
या फिर कसकने से-
हृदय के किसी अज्ञात अतल में.
हाशिया छोटा ही सही
बदल सकता है
पन्ने की इबारत
पूरी-की-पूरी
बिना दावा किये ,
दे सकता है
अर्थहीन को अर्थ
या अनर्थ.
वस्तुतः
जो कुछ भी रह गया है
कहीं कुछ होने से
मेरी ही तरह हाशिये पर है.
और उससे भी कम जितना लिखा है
और छोड़ दिया है
शब्द, वाक्य, अर्थ की पोटलियों में
इधर-उधर
मेज-किताब-अख़बार
सब कहीं भटकने के लिए
उससे कहीं ज्यादा- बहुत ज्यादा
रह गया है
टकने से-
किसी कमीज़ पर बटन बन,
छलकने से-
पवित्र अर्घ्य-सा अंजुरी से,
दहकने से-
भूख या प्यास की तरह
या फिर कसकने से-
हृदय के किसी अज्ञात अतल में.
हाशिया छोटा ही सही
बदल सकता है
पन्ने की इबारत
पूरी-की-पूरी
बिना दावा किये ,
दे सकता है
अर्थहीन को अर्थ
या अनर्थ.
वस्तुतः
जो कुछ भी रह गया है
कहीं कुछ होने से
मेरी ही तरह हाशिये पर है.
Saturday, May 15, 2010
कलफ़ लगी औरतें
----------------------------------------
कलफ लगी साड़ियाँ
सरसराती हैं नफासत से
उठते-बैठते-चलते ;
तुडती-मुडती-सिकुड़ती हैं
मोड़-दर-मोड़
भीतर-बाहर हर ओर .
अक्सर निकाली जाती हैं
इस्तिरी -बेइस्तिरी
पार्टियों-मेलों-सम्मेलनों में
रेडीमेड का लेबल लगाकर .
कलफ लगी साड़ियाँ
तकिये के नीचे नहीं तहातीं
पाजामे, गमछे या लुंगी की बगल में
कलफ लगी साड़ियाँ
हैंगर में टंगती हैं
कोट, पैंट , टाई के बराबर
टाईट .... एकदम कड़क .
कलफ लगी साड़ियाँ
अक्सर खुद नहीं जान पातीं
बढती सलवटें
दिन-महीने-साल
जो बनाते हैं उनपर .
वे तलाशती हैं नए हैंगर
नए सिरे से लटकने के लिए
हर बार.... आखिरी बार !
कलफ लगी साड़ियाँ
पोंछा नहीं बनतीं
टूट जाती हैं अक्सर
तार.........तार.......
कलफ टूटते - न टूटते .
कलफ लगी साड़ियाँ
सरसराती हैं नफासत से
उठते-बैठते-चलते ;
तुडती-मुडती-सिकुड़ती हैं
मोड़-दर-मोड़
भीतर-बाहर हर ओर .
अक्सर निकाली जाती हैं
इस्तिरी -बेइस्तिरी
पार्टियों-मेलों-सम्मेलनों में
रेडीमेड का लेबल लगाकर .
कलफ लगी साड़ियाँ
तकिये के नीचे नहीं तहातीं
पाजामे, गमछे या लुंगी की बगल में
कलफ लगी साड़ियाँ
हैंगर में टंगती हैं
कोट, पैंट , टाई के बराबर
टाईट .... एकदम कड़क .
कलफ लगी साड़ियाँ
अक्सर खुद नहीं जान पातीं
बढती सलवटें
दिन-महीने-साल
जो बनाते हैं उनपर .
वे तलाशती हैं नए हैंगर
नए सिरे से लटकने के लिए
हर बार.... आखिरी बार !
कलफ लगी साड़ियाँ
पोंछा नहीं बनतीं
टूट जाती हैं अक्सर
तार.........तार.......
कलफ टूटते - न टूटते .
Sunday, May 9, 2010
लाल सूरज
--------------------------------------
तुम देहरी पर दीप रखो- न रखो
अँधेरा घिरेगा ही
सघन या विरल ,
सपने छीजने लगें तो यही होता है--
रात बांसुरी नहीं बजाती ,
चाँद बच्चे नहीं बहलाता ,
सितारे जंगल में भेज देते हैं
भटके हुए बटोही को
और मूर्तियाँ मुस्कराने लगती हैं
श्रद्धावनत मस्तकों की मूर्खता पर.
आस्था का संकट
चरणामृत बाँटने से नहीं मिटता .
गिरने दो कलश
धूल- धूसरित हों कंगूरे
कालजयी महलों को पता तो चले
समय के बदल जाने का.
धक्का दो
धराशायी हों वटवृक्ष;
डालियाँ काटो
तने को चीरो
पोर-पोर खंगालो
बाकी न रहे कोई कोना
ढूंढो एक स्वस्थ बीज
और रोप दो वहीँ;
फिर प्रतीक्षा करो
सपनों के अंकुरित होने की .
सूर्य रक्त वर्ण होता है
रौशनी फूटती है
सूर्य रक्तवर्ण होता है
रात हो जाती है
नया युग चुप-चाप नहीं आता .
तुम देहरी पर दीप रखो- न रखो
अँधेरा घिरेगा ही
सघन या विरल ,
सपने छीजने लगें तो यही होता है--
रात बांसुरी नहीं बजाती ,
चाँद बच्चे नहीं बहलाता ,
सितारे जंगल में भेज देते हैं
भटके हुए बटोही को
और मूर्तियाँ मुस्कराने लगती हैं
श्रद्धावनत मस्तकों की मूर्खता पर.
आस्था का संकट
चरणामृत बाँटने से नहीं मिटता .
गिरने दो कलश
धूल- धूसरित हों कंगूरे
कालजयी महलों को पता तो चले
समय के बदल जाने का.
धक्का दो
धराशायी हों वटवृक्ष;
डालियाँ काटो
तने को चीरो
पोर-पोर खंगालो
बाकी न रहे कोई कोना
ढूंढो एक स्वस्थ बीज
और रोप दो वहीँ;
फिर प्रतीक्षा करो
सपनों के अंकुरित होने की .
सूर्य रक्त वर्ण होता है
रौशनी फूटती है
सूर्य रक्तवर्ण होता है
रात हो जाती है
नया युग चुप-चाप नहीं आता .
Sunday, May 2, 2010
यह मठ और गढ़ अब नहीं टूटेंगे
____________________________
यह मठ और गढ़ अब नहीं टूटेंगे
इसलिए नहीं कि
और मजबूत हो गयी हैं दीवारें
या कि और गहरी हो गयी है इनकी नींव
बल्कि इसलिए,
मात्र इसलिए कि
बेसुरे बांसों क़ी चरमराहट हकला उठी है,
कामसूत्र क़ी पोथियाँ
एडम स्मिथ क़ी अलमारियों से निकलकर
खेत-खलिहानों में फडफडा रही हैं
विभिन्न मुद्राओं में
और कुदालों क़ी प्रतिबद्धता जंग खा गयी है.
बिल्ली लाल हो या काली
चालाक हो गयी है,
अब मलाई खाती है
और चूहों का व्यापार करती है.
दीमक लगे चरखे से खेलते हैं
कुछ खाकी चूहे
और बिल्ली टकटकी बांधे खड़ी है
होंठ चाटती.
घुनी हुई लाठी एक कोने में पड़ी है .
पथराये रहनुमा सिर ताने शान से
कव्वे और कबूतर हगाते
चौराहों पर खड़े हैं
और वह
जिसे तोड़ने हैं मठ और गढ़
चरणामृत पीकर बेहोश पड़ा है.
इसीलिए कहता हूँ---
यह मठ और गढ़ अब नहीं टूटेंगे.
यह मठ और गढ़ अब नहीं टूटेंगे
इसलिए नहीं कि
और मजबूत हो गयी हैं दीवारें
या कि और गहरी हो गयी है इनकी नींव
बल्कि इसलिए,
मात्र इसलिए कि
बेसुरे बांसों क़ी चरमराहट हकला उठी है,
कामसूत्र क़ी पोथियाँ
एडम स्मिथ क़ी अलमारियों से निकलकर
खेत-खलिहानों में फडफडा रही हैं
विभिन्न मुद्राओं में
और कुदालों क़ी प्रतिबद्धता जंग खा गयी है.
बिल्ली लाल हो या काली
चालाक हो गयी है,
अब मलाई खाती है
और चूहों का व्यापार करती है.
दीमक लगे चरखे से खेलते हैं
कुछ खाकी चूहे
और बिल्ली टकटकी बांधे खड़ी है
होंठ चाटती.
घुनी हुई लाठी एक कोने में पड़ी है .
पथराये रहनुमा सिर ताने शान से
कव्वे और कबूतर हगाते
चौराहों पर खड़े हैं
और वह
जिसे तोड़ने हैं मठ और गढ़
चरणामृत पीकर बेहोश पड़ा है.
इसीलिए कहता हूँ---
यह मठ और गढ़ अब नहीं टूटेंगे.
Saturday, April 24, 2010
मैं बुद्ध नहीं हूँ
____________________________
मैं बुद्ध नहीं हूँ.
मेरे महाभिनिष्क्रमण और बुद्धत्त्व के बीच
नहीं किसी सुजाता की खीर
शाक्यों का वैभव
कपिलवस्तु के प्राचीर ;
है तो सिर्फ
यशोधरा की पीर
शुद्धोदन का मोतियाबिंद
मायादेवी का गठिया
राहुल की किताबों का बोझ
और सिद्धार्थ अकेला है.
कोई सारनाथ या बोधगया नहीं
किराये का मकान
टपकती छत
उखड़ते प्लास्टर
कहने को घर
पर
नहीं छोड़ सकता
डोर नहीं तोड़ सकता
महाभिनिष्क्रमण बेमानी है
जब तक एक भी आंख में पानी है .
अश्रुपूरित नयनों के लिए
पनियाये सपनों के लिए
जीना होगा
हर सुकरात के हिस्से का प्याला
पीना होगा.
मैं बुद्ध नहीं हूँ.
मेरे महाभिनिष्क्रमण और बुद्धत्त्व के बीच
नहीं किसी सुजाता की खीर
शाक्यों का वैभव
कपिलवस्तु के प्राचीर ;
है तो सिर्फ
यशोधरा की पीर
शुद्धोदन का मोतियाबिंद
मायादेवी का गठिया
राहुल की किताबों का बोझ
और सिद्धार्थ अकेला है.
कोई सारनाथ या बोधगया नहीं
किराये का मकान
टपकती छत
उखड़ते प्लास्टर
कहने को घर
पर
नहीं छोड़ सकता
डोर नहीं तोड़ सकता
महाभिनिष्क्रमण बेमानी है
जब तक एक भी आंख में पानी है .
अश्रुपूरित नयनों के लिए
पनियाये सपनों के लिए
जीना होगा
हर सुकरात के हिस्से का प्याला
पीना होगा.
Friday, April 16, 2010
देह की दुकानें
--------------------------
दर्द उधार नहीं लेतीं
देह की दुकानें हैं
उसूल पर चलती हैं.
अनुसूया की मर्यादा
द्रोपदी की दृढ़ता और
सीता का सतीत्व
पुते हैं सब
लिपस्टिक की परतों में .
चमकदार झलर-मलर कपड़ों के भीतर
काजल से काले हैं
आगत के डंक
भूत का भय
और घिनोनापन वर्तमान का.
गहरी रेखाएं गले की
खोह हैं गहरी ,
भूख बिलबिलाती है
बचपन से जहाँ.
नाभि-गह्वर से निकली
रोम-रेखा फैली कुचों तक
सिहरती है अक्सर
शरीर के सिहरने से --
छोटे-छोटे सपने हैं,
नन्हे-नन्हे सुख
कुछ अपने, कुछ अपनों के
तन-तन आते हैं
पूरने की आशा में .
अंग-अंग अपना
जो अपना नहीं भी है
जीता है एक-एक क्षण
दर्द नक़द लेकर .
पोर-पोर टीसता है
इतिहास सभ्यता का ,
पोर-पोर फूटता है
कोढ़ संस्कारों का .
लोथड़े में मांस के
ढूंढता है मांसपिंड
ऐसा कुछ अपरिचित
करता है पास जो
अपने कुछ और पास .
काग़ज़ के टुकड़ों में
मिलता है गोश्त सिर्फ
गोश्त बस गोश्त है.
देह के पार उतरती है देह
देह का तनाव सोखती है देह
मन पांचसाला बच्चे- सा
संभालता है अपनी टॉफियाँ, अपने खिलोने
जो अक्सर
मार खाने के बाद मिलते हैं .
देह की दुकानें
दर्द उधार नहीं लेतीं.
दर्द उधार नहीं लेतीं
देह की दुकानें हैं
उसूल पर चलती हैं.
अनुसूया की मर्यादा
द्रोपदी की दृढ़ता और
सीता का सतीत्व
पुते हैं सब
लिपस्टिक की परतों में .
चमकदार झलर-मलर कपड़ों के भीतर
काजल से काले हैं
आगत के डंक
भूत का भय
और घिनोनापन वर्तमान का.
गहरी रेखाएं गले की
खोह हैं गहरी ,
भूख बिलबिलाती है
बचपन से जहाँ.
नाभि-गह्वर से निकली
रोम-रेखा फैली कुचों तक
सिहरती है अक्सर
शरीर के सिहरने से --
छोटे-छोटे सपने हैं,
नन्हे-नन्हे सुख
कुछ अपने, कुछ अपनों के
तन-तन आते हैं
पूरने की आशा में .
अंग-अंग अपना
जो अपना नहीं भी है
जीता है एक-एक क्षण
दर्द नक़द लेकर .
पोर-पोर टीसता है
इतिहास सभ्यता का ,
पोर-पोर फूटता है
कोढ़ संस्कारों का .
लोथड़े में मांस के
ढूंढता है मांसपिंड
ऐसा कुछ अपरिचित
करता है पास जो
अपने कुछ और पास .
काग़ज़ के टुकड़ों में
मिलता है गोश्त सिर्फ
गोश्त बस गोश्त है.
देह के पार उतरती है देह
देह का तनाव सोखती है देह
मन पांचसाला बच्चे- सा
संभालता है अपनी टॉफियाँ, अपने खिलोने
जो अक्सर
मार खाने के बाद मिलते हैं .
देह की दुकानें
दर्द उधार नहीं लेतीं.
Friday, April 2, 2010
अलगनी पर टंगी औरतें
जम्फर , फरिया, ब्लाउज संग
सुबह से शाम तक
अलगनी पर टंगी रहती हैं
चिमटियों से दबी
कुछ साड़ियाँ .
गरमाई हवा में फडफडाती हैं
कभी धूप में, कभी छाँव में
सूखती हैं भाप देतीं
कड़क हो जाती हैं.
अलगनी पर टंगी साड़ियाँ
दीखती हैं , देखी जाती हैं
नज़र-बेनज़र
दबे-छिपे , सरेआम
साल में तीन सौ पैंसठ दिन
दस...बीस...पचास...सत्तर साल
उजाले में, अंधेरे में
लगातार.
अलगनी पर टंगी साड़ियाँ
अक्सर तहाती हैं चुपचाप
दिसंबर की ठंडाई साँझ-सी
परत-दर-परत;
फिर रख दी जाती हैं
पेटी,अलमारी या बिस्तर के सिरहाने-पैताने
किसी पाजामे,गमछे या लुंगी की बगल में.
कोरेपन से पोंछा बन जाने तक
बरस-दर-बरस गलती हैं
रंग......बेरंग......बदरंग ;
मसकती हैं
इधर,उधर ,चाहे जिधर से;
हुमकती हैं, रीझती हैं, खीझती हैं
अलगनी पर टंगी साड़ियाँ
बोलती नहीं हैं खुद से
केवल सुनती हैं दूसरों की आवाज़ .
अलगनी पर टंगी साड़ियाँ
अक्सर फडफडाती हैं
पर अलगनी छोड़कर नहीं जातीं
अपने-आप
टंगी रहती हैं लगातार
दस.....बीस....पचास....सत्तर साल.
(साड़ियों की जगह औरतें पढ़ें)
सुबह से शाम तक
अलगनी पर टंगी रहती हैं
चिमटियों से दबी
कुछ साड़ियाँ .
गरमाई हवा में फडफडाती हैं
कभी धूप में, कभी छाँव में
सूखती हैं भाप देतीं
कड़क हो जाती हैं.
अलगनी पर टंगी साड़ियाँ
दीखती हैं , देखी जाती हैं
नज़र-बेनज़र
दबे-छिपे , सरेआम
साल में तीन सौ पैंसठ दिन
दस...बीस...पचास...सत्तर साल
उजाले में, अंधेरे में
लगातार.
अलगनी पर टंगी साड़ियाँ
अक्सर तहाती हैं चुपचाप
दिसंबर की ठंडाई साँझ-सी
परत-दर-परत;
फिर रख दी जाती हैं
पेटी,अलमारी या बिस्तर के सिरहाने-पैताने
किसी पाजामे,गमछे या लुंगी की बगल में.
कोरेपन से पोंछा बन जाने तक
बरस-दर-बरस गलती हैं
रंग......बेरंग......बदरंग ;
मसकती हैं
इधर,उधर ,चाहे जिधर से;
हुमकती हैं, रीझती हैं, खीझती हैं
अलगनी पर टंगी साड़ियाँ
बोलती नहीं हैं खुद से
केवल सुनती हैं दूसरों की आवाज़ .
अलगनी पर टंगी साड़ियाँ
अक्सर फडफडाती हैं
पर अलगनी छोड़कर नहीं जातीं
अपने-आप
टंगी रहती हैं लगातार
दस.....बीस....पचास....सत्तर साल.
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