जिसे चाहता था मिला नहीं
जिसे पा लिया उसे क्या करूँ
मैं उदास हूँ इसी बात पर
जियूं दर्द या कि हँसा करूँ .
जिसे प्यार से कभी आंख में
मैंने स्वप्न कह के बसा लिया
उसी शाम का भला किस तरह
किसी और से मैं बयां करूँ .
ये जो दर्द है ये अजीज है
जो ये रात है ये सवाल है
यूँ ही चाहता हूँ कि टूटकर
तुझे भूलने की दुआ करूँ .
जिन्हें पढ़ लिया वही गीत हैं
जो लिखे गए वही स्वप्न हैं
जो टपक गए मेरी आंख से
तेरे उन खतों का मैं क्या करूँ.
कभी याद की किसी डाल से
जो उलझ गयी थीं शरारतें
उन्हें बारिशों ने भिगो दिया
मैं उदास हूँ तो हुआ करूँ.
Friday, September 17, 2010
Wednesday, September 15, 2010
सुन लो संसार के प्लेटो-अरस्तू
आज नहीं सदियों से
फूटते रहे हैं ज्योति-पुंज
फैलती रही है ज्ञान-रश्मि मृत्यु-लोक में
चेतना अतीत निज करने सन्धान
काल-गति के संग पांव-पांव
डगर-डगर घूमती रही है अविराम .
झाँक उर-अंतर में पाने को परम सत
अंतस की ऑंखें धुंधलाई हैं बार-बार
भीतर से बाहर फिर बाहर से भीतर
मिल जाये कुछ उत्तर
बस इसी एक प्रश्न का--
मैं कौन हूँ ?
थके हैं मन तन क्षरते गए हैं
तर्कों के स्वर घुटे प्राणहीन मौन हुए
सारे सिद्धांत , शब्द , पन्ने किताबों के
चर्चे विद्वानों के , ज्ञान की आयोजनाएं
गए तो हैं सभी किन्तु सिर्फ एक-दो ही पग .
शब्द कठिन अर्थ भरे , वाक्य सभी छोटे- बड़े
रचते हैं लोक एक भय का , रहस्य का
खींचते हैं रेखाएं धरती- आकाश तक
पाने को ओर-छोर अपना ही एक बार .
जान लिया मैंने-- यह एक ने उद्घोष किया
ज्ञानी है , ज्ञानी है-- और कई स्वर मिले
सिद्ध करो -- कहकर यह ज्ञानी एक और हुआ
और एक , और एक , एक-एक फिर कई हुए
कहने के ढंग अलग
रहने के रंग अलग
खींच लिया घेरा और मान लिया सिद्ध हुए .
अनुयायी भेड़ बने चलते हैं साथ-साथ
जिसके संग जितने हैं
वह सत है उतने अंश
सत का यह मानदंड दिया सभी ज्ञानों ने.
जो तुमने जाना था वह सत तुम्हारा था
सुन लो संसार के प्लेटो -अरस्तू ,
जिसको मैं जानूंगा वह होगा सत मेरा
मैं ही तो जानूंगा आखिर मैं कौन हूँ !
उस पल तुम थे , वह पल तुम थे
इस पल मैं हूँ , यह पल मैं हूँ
और दो पलों के बीच में अनंत है.
फूटते रहे हैं ज्योति-पुंज
फैलती रही है ज्ञान-रश्मि मृत्यु-लोक में
चेतना अतीत निज करने सन्धान
काल-गति के संग पांव-पांव
डगर-डगर घूमती रही है अविराम .
झाँक उर-अंतर में पाने को परम सत
अंतस की ऑंखें धुंधलाई हैं बार-बार
भीतर से बाहर फिर बाहर से भीतर
मिल जाये कुछ उत्तर
बस इसी एक प्रश्न का--
मैं कौन हूँ ?
थके हैं मन तन क्षरते गए हैं
तर्कों के स्वर घुटे प्राणहीन मौन हुए
सारे सिद्धांत , शब्द , पन्ने किताबों के
चर्चे विद्वानों के , ज्ञान की आयोजनाएं
गए तो हैं सभी किन्तु सिर्फ एक-दो ही पग .
शब्द कठिन अर्थ भरे , वाक्य सभी छोटे- बड़े
रचते हैं लोक एक भय का , रहस्य का
खींचते हैं रेखाएं धरती- आकाश तक
पाने को ओर-छोर अपना ही एक बार .
जान लिया मैंने-- यह एक ने उद्घोष किया
ज्ञानी है , ज्ञानी है-- और कई स्वर मिले
सिद्ध करो -- कहकर यह ज्ञानी एक और हुआ
और एक , और एक , एक-एक फिर कई हुए
कहने के ढंग अलग
रहने के रंग अलग
खींच लिया घेरा और मान लिया सिद्ध हुए .
अनुयायी भेड़ बने चलते हैं साथ-साथ
जिसके संग जितने हैं
वह सत है उतने अंश
सत का यह मानदंड दिया सभी ज्ञानों ने.
जो तुमने जाना था वह सत तुम्हारा था
सुन लो संसार के प्लेटो -अरस्तू ,
जिसको मैं जानूंगा वह होगा सत मेरा
मैं ही तो जानूंगा आखिर मैं कौन हूँ !
उस पल तुम थे , वह पल तुम थे
इस पल मैं हूँ , यह पल मैं हूँ
और दो पलों के बीच में अनंत है.
Monday, September 13, 2010
थकी-थकी निगाह
थकी-थकी निगाह ने बता दिया है ये हमें
कि देखते रहे हो तुम स्वप्न कोई रात भर
देहरी पर दीप रख मुड़ के चल दिया कोई
और संग ले गया मन भी अपने बांधकर .
बन्द मुट्ठियों से कल
फिसल गयी किरन कोई
हवा बहा के ले गयी
धुला परागकण कोई
अटक गए हो बस उसी हवा के तुम ख्याल में
नयन-जड़ी ज्यों मुद्रिका अनामिका की गाँठ पर .
दिन चढ़ा तो धुल गयी
लालिमा अंजोर की
हो गयी विलीन भी
गंध मंद भोर की
दिन चढ़े की धूप मन में रख गयी अकेलापन
रखा ज्यों रिक्त देव-गृह में दीपदान मांजकर .
कि देखते रहे हो तुम स्वप्न कोई रात भर
देहरी पर दीप रख मुड़ के चल दिया कोई
और संग ले गया मन भी अपने बांधकर .
बन्द मुट्ठियों से कल
फिसल गयी किरन कोई
हवा बहा के ले गयी
धुला परागकण कोई
अटक गए हो बस उसी हवा के तुम ख्याल में
नयन-जड़ी ज्यों मुद्रिका अनामिका की गाँठ पर .
दिन चढ़ा तो धुल गयी
लालिमा अंजोर की
हो गयी विलीन भी
गंध मंद भोर की
दिन चढ़े की धूप मन में रख गयी अकेलापन
रखा ज्यों रिक्त देव-गृह में दीपदान मांजकर .
Monday, August 23, 2010
राखियों की डोर- सी
राखियों की डोर- सी पावन हैं बहनें
जो कलाई पर बँधा करती हैं शुभ आशीष -सी ।
गोद रखतीं , पालती हैं
पितृ बनकर , मात बनकर
और चुभती भी कभी हैं
डाँट बनकर , बात बनकर
जो खुली रहती हैं हरदम
स्नेह की ऐसी गठरियाँ
थाम लेती हैं दुखों में
मित्रता का हाथ बनकर
पावन ऋचाएं मन्त्र मनभावन हैं बहनें
जो दिशाओं में बसा करती हैं शुभ आशीष -सी ।
जो कलाई पर बँधा करती हैं शुभ आशीष -सी ।
गोद रखतीं , पालती हैं
पितृ बनकर , मात बनकर
और चुभती भी कभी हैं
डाँट बनकर , बात बनकर
जो खुली रहती हैं हरदम
स्नेह की ऐसी गठरियाँ
थाम लेती हैं दुखों में
मित्रता का हाथ बनकर
पावन ऋचाएं मन्त्र मनभावन हैं बहनें
जो दिशाओं में बसा करती हैं शुभ आशीष -सी ।
Tuesday, August 10, 2010
बरसाती दोहे
काले बादल आ गए , पानी का घट साथ
जाने किसने क्या कहा, गीली हो गयी रात.
डूबी क्यारी धान की, पानी बढ़ा अपार
हंसिया बैठा सोचता , कैसे कटे कुआर .
धरती ने कल कर दिया, सूरज से परिहास
गुस्से में वह रूठकर , ले बैठा संन्यास .
हर पनघट से कह गयी , पुरवा यह सन्देश
धूप बिचारी जा रही , कुछ दिन को परदेश .
धानी चूनर दे गयी , धरती को बरसात
बादल भी दिल खोलकर , बरसा सारी रात.
संबंधों की डोर में , बंधा है सब संसार
बादल आया पाहुना , पपीहा करे पुकार .
वक़्त-वक़्त की बात है, अजब वक़्त की चाल
नदिया से मिलने चला , सूखा तुलसी ताल.
आदर्शों के देश में , संघर्षों की बात
चंदा की अठखेलियाँ , पानी भरी परात .
जाने किसने क्या कहा, गीली हो गयी रात.
डूबी क्यारी धान की, पानी बढ़ा अपार
हंसिया बैठा सोचता , कैसे कटे कुआर .
धरती ने कल कर दिया, सूरज से परिहास
गुस्से में वह रूठकर , ले बैठा संन्यास .
हर पनघट से कह गयी , पुरवा यह सन्देश
धूप बिचारी जा रही , कुछ दिन को परदेश .
धानी चूनर दे गयी , धरती को बरसात
बादल भी दिल खोलकर , बरसा सारी रात.
संबंधों की डोर में , बंधा है सब संसार
बादल आया पाहुना , पपीहा करे पुकार .
वक़्त-वक़्त की बात है, अजब वक़्त की चाल
नदिया से मिलने चला , सूखा तुलसी ताल.
आदर्शों के देश में , संघर्षों की बात
चंदा की अठखेलियाँ , पानी भरी परात .
Saturday, August 7, 2010
अचानक यूँ ही
डायरी का पृष्ठ पलटा
और तुम्हारा नाम देखा
जो लिखा था स्वयं मैंने
स्नेह-भीगे क्षण किसी.
अक्षरों के घूम जाने
झूम-झट कर ठिठक जाने
घुंडियों के घूम-फिरकर
लौट आने , दूर जाने --
चढ़ाईयां चढ़ने-उतरने से जनित
श्रम-बिंदु जैसे
ऋजु किसी या वक्र रेखा के
तने मस्तक-शिखर पर
बिंदु बनकर बैठ जाने --
में तुम्हीं ऐसा लगा ज्यों
देखती रहतीं मुझे
निर्निमेष अपलक नयन .
एक ही है शब्द लेकिन
तुम कभी हंसती हुई ,
लाज से बोझिल पलक
अश्रु में भीगी कभी ,
देहरी पर दीप थामे
केश की छाया किये
हँस पड़ी कुछ सोचकर
ज्यों बात करते आपसे ,
अनामिका की गाँठ पर
अटकी अंगूठी जड़े नयन
रक्ताभ मुख हिलते अधर
ध्वनिहीन शब्द मुखरित हुआ मन .
कल्पनाओं के अनंत
लोक में आलोक बन
एक ध्वनि ले डोलता हूँ
शब्द से आगे जहाँ
अर्थ की संभावनाएं
जुड़ गयीं आकार से .
बढ़ हवा ने एकदम
मूंद दीं पलकें मेरी
चू पड़ा हूँ आँख से मैं
डायरी के पृष्ठ पर
और तुम्हारा नाम मुझमें
घुल रहा है बिंदु-बिंदु.
और तुम्हारा नाम देखा
जो लिखा था स्वयं मैंने
स्नेह-भीगे क्षण किसी.
अक्षरों के घूम जाने
झूम-झट कर ठिठक जाने
घुंडियों के घूम-फिरकर
लौट आने , दूर जाने --
चढ़ाईयां चढ़ने-उतरने से जनित
श्रम-बिंदु जैसे
ऋजु किसी या वक्र रेखा के
तने मस्तक-शिखर पर
बिंदु बनकर बैठ जाने --
में तुम्हीं ऐसा लगा ज्यों
देखती रहतीं मुझे
निर्निमेष अपलक नयन .
एक ही है शब्द लेकिन
तुम कभी हंसती हुई ,
लाज से बोझिल पलक
अश्रु में भीगी कभी ,
देहरी पर दीप थामे
केश की छाया किये
हँस पड़ी कुछ सोचकर
ज्यों बात करते आपसे ,
अनामिका की गाँठ पर
अटकी अंगूठी जड़े नयन
रक्ताभ मुख हिलते अधर
ध्वनिहीन शब्द मुखरित हुआ मन .
कल्पनाओं के अनंत
लोक में आलोक बन
एक ध्वनि ले डोलता हूँ
शब्द से आगे जहाँ
अर्थ की संभावनाएं
जुड़ गयीं आकार से .
बढ़ हवा ने एकदम
मूंद दीं पलकें मेरी
चू पड़ा हूँ आँख से मैं
डायरी के पृष्ठ पर
और तुम्हारा नाम मुझमें
घुल रहा है बिंदु-बिंदु.
Saturday, July 31, 2010
बरसात और तुम
तुम्हारे नाम के सारे
किन्हीं पुरुवाइओं के ख़त
रखे हैं मैंने
नयन में सहेजकर
क्षितिज पर झुक आए
मोरपंखी बादलों-से .
तुम्हारे नयनों से ढुलकी
स्वाति की बूँदें
सीपिया हथेलियों में
बटोर ली हैं मैंने
अगले जन्मों के लिए.
सुनो,
पगडंडियों से नीचे उतरते
मत देखना मुडकर इधर
बंध जाओगे मेरी तरह
सन्नाटे के आकर्षण में तुम भी.
जादू है तुम्हारी उँगलियों में
मत छूना मन
पिछली बरसात में खोया मैं
ढूंढता हूँ आज भी खुद को
यहाँ-वहां तुम्हारे आस-पास .
किन्हीं पुरुवाइओं के ख़त
रखे हैं मैंने
नयन में सहेजकर
क्षितिज पर झुक आए
मोरपंखी बादलों-से .
तुम्हारे नयनों से ढुलकी
स्वाति की बूँदें
सीपिया हथेलियों में
बटोर ली हैं मैंने
अगले जन्मों के लिए.
सुनो,
पगडंडियों से नीचे उतरते
मत देखना मुडकर इधर
बंध जाओगे मेरी तरह
सन्नाटे के आकर्षण में तुम भी.
जादू है तुम्हारी उँगलियों में
मत छूना मन
पिछली बरसात में खोया मैं
ढूंढता हूँ आज भी खुद को
यहाँ-वहां तुम्हारे आस-पास .
Sunday, July 25, 2010
कोई ऐसे भी किसी को चाहता है भला !
कोई ऐसे भी किसी को चाहता है भला
जैसे तुमने मुझे चाहा एकदम टूटकर
कि दुनिया के सभी रस्मो-रिवाज़ बिखर गए ,
किस्सों कि दुनिया से निकलीं आत्माएं
और हमारे जिस्मों में बेतरह समा गयीं .
दुनिया के बनने के दिन मिटटी का एक लोंदा
टूटकर बंट गया दो हिस्सों में
एक के पास रह गयी दूसरे की कुछ अमानत
कुछ आड़ी-तिरछी-सी पहचान रह गयी कसकती
जिस्म के उस हिस्से में दबी
जिसे इन्सान ने युगों बाद दिल कहा .
दोनों हिस्सों को पता ही न चला
कि कब उस बनानेवाले ने घुमाईं उँगलियाँ
और उन्हें छोड़ दिया समय और आकाश की अनंतता में
एक-दूसरे की तलाश में भटकने के लिए .
दिन बना, दुनिया बनी, धरती और दरिया बने
हरे दरख्तों की छाँव में उतरीं सतरंगी किरणें
चिड़ियों ने सीखे जलतरंगों के गीत
तभी मिट्टी के लोंदे का वह टुकड़ा आ निकला
दरिया के किनारे-किनारे तलाशता अपनी अमानत
वह आड़ी -तिरछी पहचान छिपाए जिस्म के उस हिस्से में
जिसे इंसान ने युगों बाद दिल कहा .
उसी दरख़्त के नीचे सतरंगी किरनों की खुमारी में सोया
जागा सुनकर जलतरंगों से सीखा चिड़ियों का गीत
और तभी उसने जाना कि वह सपने देख सकता है.
दिन बीते , रातें बीतीं, चिड़ियों ने गा दिए अपने सभी गीत
दरख्तों ने पत्ते झाड़े और फिर नए कपड़े पहने
सतरंगी किरणों ने बनाये बहुत सारे इन्द्रधनुष
वह टुकड़ा फिर भी बेचैन-सा ताकता रहा
उफनते हुए दरिया का पानी दिन और रात
दिन और रात महसूस करता अजानी-सी टीस
कभी-कभी चीख पड़ता जोर से कोई नाम
जिसका अर्थ उस दरिया के सिवा कोई नहीं जानता था.
यूँ ही बहते दरिया को बीते कुछ और बरस
कुछ और ऊँचे हो गए किनारे दरिया के
चिड़ियों कि नयी पीढ़ियाँ भूलने लगीं जलतरंगों से सीखे गीत .
एक दिन दरख्तों तले उतरी सतरंगी किरणों ने देखा
वह टुकड़ा बेचैन-सा चीखा फिर वही नाम
और दूर दरिया के उस पार एक परछाईं हिल पड़ी रेत में
दोनों ओर दरिया के उभरी शाश्वत पहचान की चमक
हिलती परछाईं दौड़कर कूद पड़ी दरिया में
उस टुकड़े ने भी लगायी छलांग और दरिया हँस पड़ा .
इधर कसक बढती रही और उधर गति
पर इनसे भी तेज़ बढ़ती रही दरिया की धार
अनंत समय और आकाश सिमटकर दृष्टि-सीमा तक आ गए
वह आड़ी-तिरछी पहचान सीधी हो स्पष्ट हो गयी
चरम पर पहुँच गयी वह आदिम कसक
जो जिस्म के उस हिस्से में थी जिसे इंसान ने युगों बाद दिल कहा .
एक लम्बी यात्रा की थकन आँखों में उतर आई
साँसें रोके दरख्तों, सतरंगी किरणों और चिड़ियों ने देखा
समय और आकाश का सिमटना नहीं संभाल पाया दरिया
एक उफान आया और आकाश फैल गया
एक लहर गिरी और समय पसर गया
न वह परछाईं रही न वह टुकड़ा .
चिड़ियों को भूले गीत फिर याद आ गए
सतरंगी किरणों ने फिर बनाये ढेर सारे इन्द्रधनुष
और दरिया यों ही बहता रहा निरंतर .
हर दिन हर पल दुहराया जाता यह किस्सा
लगा था कि ठहर जायेगा हमपर- तुमपर
कोई ऐसे भी किसी को चाहता है भला
कि किस्सों की दुनिया से निकलें आत्माएं
और बेतरह समा जाएँ हमारे जिस्मों में.
चुपचाप बहता दरिया हँस पड़े यों ही
और चिड़ियों को याद आ जाएँ भूले गीत
कहीं ऐसे भी किसी को कोई चाहता है भला.
जैसे तुमने मुझे चाहा एकदम टूटकर
कि दुनिया के सभी रस्मो-रिवाज़ बिखर गए ,
किस्सों कि दुनिया से निकलीं आत्माएं
और हमारे जिस्मों में बेतरह समा गयीं .
दुनिया के बनने के दिन मिटटी का एक लोंदा
टूटकर बंट गया दो हिस्सों में
एक के पास रह गयी दूसरे की कुछ अमानत
कुछ आड़ी-तिरछी-सी पहचान रह गयी कसकती
जिस्म के उस हिस्से में दबी
जिसे इन्सान ने युगों बाद दिल कहा .
दोनों हिस्सों को पता ही न चला
कि कब उस बनानेवाले ने घुमाईं उँगलियाँ
और उन्हें छोड़ दिया समय और आकाश की अनंतता में
एक-दूसरे की तलाश में भटकने के लिए .
दिन बना, दुनिया बनी, धरती और दरिया बने
हरे दरख्तों की छाँव में उतरीं सतरंगी किरणें
चिड़ियों ने सीखे जलतरंगों के गीत
तभी मिट्टी के लोंदे का वह टुकड़ा आ निकला
दरिया के किनारे-किनारे तलाशता अपनी अमानत
वह आड़ी -तिरछी पहचान छिपाए जिस्म के उस हिस्से में
जिसे इंसान ने युगों बाद दिल कहा .
उसी दरख़्त के नीचे सतरंगी किरनों की खुमारी में सोया
जागा सुनकर जलतरंगों से सीखा चिड़ियों का गीत
और तभी उसने जाना कि वह सपने देख सकता है.
दिन बीते , रातें बीतीं, चिड़ियों ने गा दिए अपने सभी गीत
दरख्तों ने पत्ते झाड़े और फिर नए कपड़े पहने
सतरंगी किरणों ने बनाये बहुत सारे इन्द्रधनुष
वह टुकड़ा फिर भी बेचैन-सा ताकता रहा
उफनते हुए दरिया का पानी दिन और रात
दिन और रात महसूस करता अजानी-सी टीस
कभी-कभी चीख पड़ता जोर से कोई नाम
जिसका अर्थ उस दरिया के सिवा कोई नहीं जानता था.
यूँ ही बहते दरिया को बीते कुछ और बरस
कुछ और ऊँचे हो गए किनारे दरिया के
चिड़ियों कि नयी पीढ़ियाँ भूलने लगीं जलतरंगों से सीखे गीत .
एक दिन दरख्तों तले उतरी सतरंगी किरणों ने देखा
वह टुकड़ा बेचैन-सा चीखा फिर वही नाम
और दूर दरिया के उस पार एक परछाईं हिल पड़ी रेत में
दोनों ओर दरिया के उभरी शाश्वत पहचान की चमक
हिलती परछाईं दौड़कर कूद पड़ी दरिया में
उस टुकड़े ने भी लगायी छलांग और दरिया हँस पड़ा .
इधर कसक बढती रही और उधर गति
पर इनसे भी तेज़ बढ़ती रही दरिया की धार
अनंत समय और आकाश सिमटकर दृष्टि-सीमा तक आ गए
वह आड़ी-तिरछी पहचान सीधी हो स्पष्ट हो गयी
चरम पर पहुँच गयी वह आदिम कसक
जो जिस्म के उस हिस्से में थी जिसे इंसान ने युगों बाद दिल कहा .
एक लम्बी यात्रा की थकन आँखों में उतर आई
साँसें रोके दरख्तों, सतरंगी किरणों और चिड़ियों ने देखा
समय और आकाश का सिमटना नहीं संभाल पाया दरिया
एक उफान आया और आकाश फैल गया
एक लहर गिरी और समय पसर गया
न वह परछाईं रही न वह टुकड़ा .
चिड़ियों को भूले गीत फिर याद आ गए
सतरंगी किरणों ने फिर बनाये ढेर सारे इन्द्रधनुष
और दरिया यों ही बहता रहा निरंतर .
हर दिन हर पल दुहराया जाता यह किस्सा
लगा था कि ठहर जायेगा हमपर- तुमपर
कोई ऐसे भी किसी को चाहता है भला
कि किस्सों की दुनिया से निकलें आत्माएं
और बेतरह समा जाएँ हमारे जिस्मों में.
चुपचाप बहता दरिया हँस पड़े यों ही
और चिड़ियों को याद आ जाएँ भूले गीत
कहीं ऐसे भी किसी को कोई चाहता है भला.
Friday, July 16, 2010
अंत श्रावण का मेघ
ऐसी पहचान तो न थी तुमसे
कि मन उदास हो जाये इतना
निगाह मुड़ ही जाती है उस ओर
दर्द नया है अभी ,
पांव भूल जाते हैं रास्ता
चौराहे पर पहुंचकर
आदत पुरानी है बहुत ,
सपाट , बिलकुल सपाट
डामर की सड़क-सी बात
निकली निकलने-सी
और हवा में कमरे की
भक्क से फैल गयी ,
कहीं कुछ काँपा भीतर
तरल परछाईं -सा
मन था शायद.
सुख होता है , सुख
किसी अपने के सुख से ,
तुमने घर चुना है
और मैंने घर का सपना
तुम उसे सजाओ
मैं इसे संवारूं
सुख दोनों ही ओर होगा
-- ऐसा ही कुछ कहा मैंने
ऐसा ही कुछ सुना तुमने
फिर यह अंत श्रावण का मेघ
आँखों में क्यों उतर आता है बार-बार
चुपचाप भले मानुष-सा.
कि मन उदास हो जाये इतना
निगाह मुड़ ही जाती है उस ओर
दर्द नया है अभी ,
पांव भूल जाते हैं रास्ता
चौराहे पर पहुंचकर
आदत पुरानी है बहुत ,
सपाट , बिलकुल सपाट
डामर की सड़क-सी बात
निकली निकलने-सी
और हवा में कमरे की
भक्क से फैल गयी ,
कहीं कुछ काँपा भीतर
तरल परछाईं -सा
मन था शायद.
सुख होता है , सुख
किसी अपने के सुख से ,
तुमने घर चुना है
और मैंने घर का सपना
तुम उसे सजाओ
मैं इसे संवारूं
सुख दोनों ही ओर होगा
-- ऐसा ही कुछ कहा मैंने
ऐसा ही कुछ सुना तुमने
फिर यह अंत श्रावण का मेघ
आँखों में क्यों उतर आता है बार-बार
चुपचाप भले मानुष-सा.
Tuesday, July 6, 2010
तसला भर आदमी
हिंडन के पानी में परछाईं धूम की
जलती हैं लकड़ियाँ चिटखकर श्मशान में
चिटखता है सब कुछ बिखरता है शीशे-सा
किरचें चुभती हैं नश्तर-सी यादों की
ऊदी लकड़ी-सा धुन्धुआता है मन
आँखों में उठती हैं लपटें दिक्दाह की
बुद्धि में उभरता है एक विकराल शून्य.
लकड़ियों पर लकड़ियाँ आड़ी-टेढ़ी-तिरछी
एक-पर-एक एक निश्चित पैटर्न में
ऐसे ही जैसे कोई जोड़ता है जीवन भर
सुख-दुःख के साधन एहतियात से
स्तूप खड़ा करता है सच के , कुछ झूठ के
रचता है अपना सुगढ़ सुंदर व्यक्तित्व .
लकड़ियों के मध्य एक काया सुकुमार-सी
विस्तार सपनों का पसरा था कल तक जो
अनंत की सीमाओं तक आज एक शून्य मात्र
घरोंदे का सुख और कामिनी की कामना
ऋतुओं से जुडी-बंधी देह की छुवन-तपन
शेष नहीं कुछ भी अब वासना-पवित्रता .
बाजू जो कसकर निचोड़ते थे सुख-दुःख
भरोसा थे संकट के पार ले जाने का
अन्याय के प्रतिकार हेतु उठते उत्साह भर
लोरी के ताल पर झूले-से झूलते
संबल बन ले चलते गुरुजन का वार्धक्य
दुःख जिसपर टिककर पा लेता धीरज
करते थे रचनाएँ कला और संस्कृति की
सभ्यता को देते थे वैशिष्ट्य इतिहास का
क्षमता थी थामने की कलम और तलवार संग
धरती की छाती से जीवन उपजाने की
रेखाओं में आता था भर देना जीवन
स्पंदित कर देना पत्थर की जड़ता को
आज वही निष्पंद बर्फ की शिलाओं-से.
चेहरा जो यूसुफ-नार्सिसस-कंदर्प था
प्रकृति का समेटे था सारा सौंदर्य
भौंहों का तनना मुस्का भर जाना होंठों का
सन्चरित करता जो भावों-विभावों की श्रृंखला
करता रहा जिसकी रखवाली दिठोना
माँ ने निहारा था रातों को जाग-जाग ,
ऑंखें जो साक्षात् जीवन का चिह्न थीं
खंजन-कमल-मीन रचती थीं उपमान
जीवन छलकता था स्वच्छ नील दर्पण से
बोल-बोल पड़ता था ह्रदय भाव-विह्वल हो
प्रेम की मनुहार भरी बातें प्रतिबिंबित हो
रचती थीं लोक एक अलोकिक सौंदर्य का,
अनदेखी राहों को मापने का हौसला
दम ढूंढ लेने का नए-नए विश्व कई
ललक लाँघ लेने की पर्वतों की चोटियाँ
ज्ञान का आलोक भर लेने को मुट्ठी में
पाने को रहस्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का
मौन पड़ी मिटटी-सी जिज्ञासा दुर्दमनीय .
ज्वाला सब लील लेती छोडती नहीं है कुछ
प्रज्ञा , स्मृति , बुद्धि , साहस , परिकल्पना
नहीं शेष रहता है कोई अभिज्ञान- चिह्न
प्यार-सुख-वैभव या उनकी सम्भावना .
युद्धवीर , धर्मवीर , दानवीर श्रेष्ठ सभी
अंतिम गति एक सी, एक सी असमर्थता
लील गयी अग्नि-ज्वाल सुन्दर सुकुमार देह
दूध धुले फूल बचे, और बचा---- तसला भर आदमी!!!
जलती हैं लकड़ियाँ चिटखकर श्मशान में
चिटखता है सब कुछ बिखरता है शीशे-सा
किरचें चुभती हैं नश्तर-सी यादों की
ऊदी लकड़ी-सा धुन्धुआता है मन
आँखों में उठती हैं लपटें दिक्दाह की
बुद्धि में उभरता है एक विकराल शून्य.
लकड़ियों पर लकड़ियाँ आड़ी-टेढ़ी-तिरछी
एक-पर-एक एक निश्चित पैटर्न में
ऐसे ही जैसे कोई जोड़ता है जीवन भर
सुख-दुःख के साधन एहतियात से
स्तूप खड़ा करता है सच के , कुछ झूठ के
रचता है अपना सुगढ़ सुंदर व्यक्तित्व .
लकड़ियों के मध्य एक काया सुकुमार-सी
विस्तार सपनों का पसरा था कल तक जो
अनंत की सीमाओं तक आज एक शून्य मात्र
घरोंदे का सुख और कामिनी की कामना
ऋतुओं से जुडी-बंधी देह की छुवन-तपन
शेष नहीं कुछ भी अब वासना-पवित्रता .
बाजू जो कसकर निचोड़ते थे सुख-दुःख
भरोसा थे संकट के पार ले जाने का
अन्याय के प्रतिकार हेतु उठते उत्साह भर
लोरी के ताल पर झूले-से झूलते
संबल बन ले चलते गुरुजन का वार्धक्य
दुःख जिसपर टिककर पा लेता धीरज
करते थे रचनाएँ कला और संस्कृति की
सभ्यता को देते थे वैशिष्ट्य इतिहास का
क्षमता थी थामने की कलम और तलवार संग
धरती की छाती से जीवन उपजाने की
रेखाओं में आता था भर देना जीवन
स्पंदित कर देना पत्थर की जड़ता को
आज वही निष्पंद बर्फ की शिलाओं-से.
चेहरा जो यूसुफ-नार्सिसस-कंदर्प था
प्रकृति का समेटे था सारा सौंदर्य
भौंहों का तनना मुस्का भर जाना होंठों का
सन्चरित करता जो भावों-विभावों की श्रृंखला
करता रहा जिसकी रखवाली दिठोना
माँ ने निहारा था रातों को जाग-जाग ,
ऑंखें जो साक्षात् जीवन का चिह्न थीं
खंजन-कमल-मीन रचती थीं उपमान
जीवन छलकता था स्वच्छ नील दर्पण से
बोल-बोल पड़ता था ह्रदय भाव-विह्वल हो
प्रेम की मनुहार भरी बातें प्रतिबिंबित हो
रचती थीं लोक एक अलोकिक सौंदर्य का,
अनदेखी राहों को मापने का हौसला
दम ढूंढ लेने का नए-नए विश्व कई
ललक लाँघ लेने की पर्वतों की चोटियाँ
ज्ञान का आलोक भर लेने को मुट्ठी में
पाने को रहस्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का
मौन पड़ी मिटटी-सी जिज्ञासा दुर्दमनीय .
ज्वाला सब लील लेती छोडती नहीं है कुछ
प्रज्ञा , स्मृति , बुद्धि , साहस , परिकल्पना
नहीं शेष रहता है कोई अभिज्ञान- चिह्न
प्यार-सुख-वैभव या उनकी सम्भावना .
युद्धवीर , धर्मवीर , दानवीर श्रेष्ठ सभी
अंतिम गति एक सी, एक सी असमर्थता
लील गयी अग्नि-ज्वाल सुन्दर सुकुमार देह
दूध धुले फूल बचे, और बचा---- तसला भर आदमी!!!
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