ऐसी पहचान तो न थी तुमसे
कि मन उदास हो जाये इतना
निगाह मुड़ ही जाती है उस ओर
दर्द नया है अभी ,
पांव भूल जाते हैं रास्ता
चौराहे पर पहुंचकर
आदत पुरानी है बहुत ,
सपाट , बिलकुल सपाट
डामर की सड़क-सी बात
निकली निकलने-सी
और हवा में कमरे की
भक्क से फैल गयी ,
कहीं कुछ काँपा भीतर
तरल परछाईं -सा
मन था शायद.
सुख होता है , सुख
किसी अपने के सुख से ,
तुमने घर चुना है
और मैंने घर का सपना
तुम उसे सजाओ
मैं इसे संवारूं
सुख दोनों ही ओर होगा
-- ऐसा ही कुछ कहा मैंने
ऐसा ही कुछ सुना तुमने
फिर यह अंत श्रावण का मेघ
आँखों में क्यों उतर आता है बार-बार
चुपचाप भले मानुष-सा.
Friday, July 16, 2010
Tuesday, July 6, 2010
तसला भर आदमी
हिंडन के पानी में परछाईं धूम की
जलती हैं लकड़ियाँ चिटखकर श्मशान में
चिटखता है सब कुछ बिखरता है शीशे-सा
किरचें चुभती हैं नश्तर-सी यादों की
ऊदी लकड़ी-सा धुन्धुआता है मन
आँखों में उठती हैं लपटें दिक्दाह की
बुद्धि में उभरता है एक विकराल शून्य.
लकड़ियों पर लकड़ियाँ आड़ी-टेढ़ी-तिरछी
एक-पर-एक एक निश्चित पैटर्न में
ऐसे ही जैसे कोई जोड़ता है जीवन भर
सुख-दुःख के साधन एहतियात से
स्तूप खड़ा करता है सच के , कुछ झूठ के
रचता है अपना सुगढ़ सुंदर व्यक्तित्व .
लकड़ियों के मध्य एक काया सुकुमार-सी
विस्तार सपनों का पसरा था कल तक जो
अनंत की सीमाओं तक आज एक शून्य मात्र
घरोंदे का सुख और कामिनी की कामना
ऋतुओं से जुडी-बंधी देह की छुवन-तपन
शेष नहीं कुछ भी अब वासना-पवित्रता .
बाजू जो कसकर निचोड़ते थे सुख-दुःख
भरोसा थे संकट के पार ले जाने का
अन्याय के प्रतिकार हेतु उठते उत्साह भर
लोरी के ताल पर झूले-से झूलते
संबल बन ले चलते गुरुजन का वार्धक्य
दुःख जिसपर टिककर पा लेता धीरज
करते थे रचनाएँ कला और संस्कृति की
सभ्यता को देते थे वैशिष्ट्य इतिहास का
क्षमता थी थामने की कलम और तलवार संग
धरती की छाती से जीवन उपजाने की
रेखाओं में आता था भर देना जीवन
स्पंदित कर देना पत्थर की जड़ता को
आज वही निष्पंद बर्फ की शिलाओं-से.
चेहरा जो यूसुफ-नार्सिसस-कंदर्प था
प्रकृति का समेटे था सारा सौंदर्य
भौंहों का तनना मुस्का भर जाना होंठों का
सन्चरित करता जो भावों-विभावों की श्रृंखला
करता रहा जिसकी रखवाली दिठोना
माँ ने निहारा था रातों को जाग-जाग ,
ऑंखें जो साक्षात् जीवन का चिह्न थीं
खंजन-कमल-मीन रचती थीं उपमान
जीवन छलकता था स्वच्छ नील दर्पण से
बोल-बोल पड़ता था ह्रदय भाव-विह्वल हो
प्रेम की मनुहार भरी बातें प्रतिबिंबित हो
रचती थीं लोक एक अलोकिक सौंदर्य का,
अनदेखी राहों को मापने का हौसला
दम ढूंढ लेने का नए-नए विश्व कई
ललक लाँघ लेने की पर्वतों की चोटियाँ
ज्ञान का आलोक भर लेने को मुट्ठी में
पाने को रहस्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का
मौन पड़ी मिटटी-सी जिज्ञासा दुर्दमनीय .
ज्वाला सब लील लेती छोडती नहीं है कुछ
प्रज्ञा , स्मृति , बुद्धि , साहस , परिकल्पना
नहीं शेष रहता है कोई अभिज्ञान- चिह्न
प्यार-सुख-वैभव या उनकी सम्भावना .
युद्धवीर , धर्मवीर , दानवीर श्रेष्ठ सभी
अंतिम गति एक सी, एक सी असमर्थता
लील गयी अग्नि-ज्वाल सुन्दर सुकुमार देह
दूध धुले फूल बचे, और बचा---- तसला भर आदमी!!!
जलती हैं लकड़ियाँ चिटखकर श्मशान में
चिटखता है सब कुछ बिखरता है शीशे-सा
किरचें चुभती हैं नश्तर-सी यादों की
ऊदी लकड़ी-सा धुन्धुआता है मन
आँखों में उठती हैं लपटें दिक्दाह की
बुद्धि में उभरता है एक विकराल शून्य.
लकड़ियों पर लकड़ियाँ आड़ी-टेढ़ी-तिरछी
एक-पर-एक एक निश्चित पैटर्न में
ऐसे ही जैसे कोई जोड़ता है जीवन भर
सुख-दुःख के साधन एहतियात से
स्तूप खड़ा करता है सच के , कुछ झूठ के
रचता है अपना सुगढ़ सुंदर व्यक्तित्व .
लकड़ियों के मध्य एक काया सुकुमार-सी
विस्तार सपनों का पसरा था कल तक जो
अनंत की सीमाओं तक आज एक शून्य मात्र
घरोंदे का सुख और कामिनी की कामना
ऋतुओं से जुडी-बंधी देह की छुवन-तपन
शेष नहीं कुछ भी अब वासना-पवित्रता .
बाजू जो कसकर निचोड़ते थे सुख-दुःख
भरोसा थे संकट के पार ले जाने का
अन्याय के प्रतिकार हेतु उठते उत्साह भर
लोरी के ताल पर झूले-से झूलते
संबल बन ले चलते गुरुजन का वार्धक्य
दुःख जिसपर टिककर पा लेता धीरज
करते थे रचनाएँ कला और संस्कृति की
सभ्यता को देते थे वैशिष्ट्य इतिहास का
क्षमता थी थामने की कलम और तलवार संग
धरती की छाती से जीवन उपजाने की
रेखाओं में आता था भर देना जीवन
स्पंदित कर देना पत्थर की जड़ता को
आज वही निष्पंद बर्फ की शिलाओं-से.
चेहरा जो यूसुफ-नार्सिसस-कंदर्प था
प्रकृति का समेटे था सारा सौंदर्य
भौंहों का तनना मुस्का भर जाना होंठों का
सन्चरित करता जो भावों-विभावों की श्रृंखला
करता रहा जिसकी रखवाली दिठोना
माँ ने निहारा था रातों को जाग-जाग ,
ऑंखें जो साक्षात् जीवन का चिह्न थीं
खंजन-कमल-मीन रचती थीं उपमान
जीवन छलकता था स्वच्छ नील दर्पण से
बोल-बोल पड़ता था ह्रदय भाव-विह्वल हो
प्रेम की मनुहार भरी बातें प्रतिबिंबित हो
रचती थीं लोक एक अलोकिक सौंदर्य का,
अनदेखी राहों को मापने का हौसला
दम ढूंढ लेने का नए-नए विश्व कई
ललक लाँघ लेने की पर्वतों की चोटियाँ
ज्ञान का आलोक भर लेने को मुट्ठी में
पाने को रहस्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का
मौन पड़ी मिटटी-सी जिज्ञासा दुर्दमनीय .
ज्वाला सब लील लेती छोडती नहीं है कुछ
प्रज्ञा , स्मृति , बुद्धि , साहस , परिकल्पना
नहीं शेष रहता है कोई अभिज्ञान- चिह्न
प्यार-सुख-वैभव या उनकी सम्भावना .
युद्धवीर , धर्मवीर , दानवीर श्रेष्ठ सभी
अंतिम गति एक सी, एक सी असमर्थता
लील गयी अग्नि-ज्वाल सुन्दर सुकुमार देह
दूध धुले फूल बचे, और बचा---- तसला भर आदमी!!!
Wednesday, June 30, 2010
एक अनलिखा खत
चाहता हूँ मैं कि तुमको ख़ूबसूरत ख़त लिखूं
ख़त कि जिसमें मौन भी हो बात भी हो
ख़त कि जिसमें चाँद भी हो रात भी हो
ख़त कि जिसमें शबनमी सौगात भी हो
ख़त कि जिसमें स्नेह की बरसात भी हो
अनकहे किस्से भी हों कुछ अनछुए पल भी कुछेक
उम्र के इस मोड़ पर एक बचपनी हसरत लिखूं .
चाहता हूँ मैं कि तुमको ख़ूबसूरत ख़त लिखूं.
रेत के कच्चे घरोंदों-सा सजीला ख़त
गुलमुहर के फूल-सा कुछ लाल-पीला ख़त
याद की उतरन में संवरा तंग-ढीला ख़त
कोर पर आँखों की उभरा मन , पनीला ख़त
इस बरस बरसात में चमके हैं ढेरों इन्द्रधनु
छोर की ख्वाहिश में उलझा मौन मन आहत लिखूं .
चाहता हूँ मैं कि तुमको ख़ूबसूरत ख़त लिखूं
ख़त कि जैसे अधखिले फूल की एक पाँखुरी
ख़त कि जैसे जेठ में पुरुवाईओ की झुरझुरी
ख़त कि जैसे भोर में बज उठी हो बांसुरी
ख़त कि जैसे रामगिरि से आ मिली अलकापुरी
बादलों को दूत भेजा था कभी एक यक्ष ने
ऋतुमती ऋतुओं की अलकें बांध संयम-व्रत लिखूं.
चाहता हूँ मैं कि तुमको ख़ूबसूरत ख़त लिखूं
ख़त कि जिससे मौन-मंदिर में बजें कुछ घंटियाँ
ख़त कि जिससे धूममय हों कामना की वेदियाँ
ख़त कि जिससे गूँज जाएँ गीत-गोविन्द-पंक्तियाँ
ख़त कि जिससे पा सके कान्ह बिछुड़ी कनुप्रिया
एक लोटा जल सुबह सूरज को एक दिन भेंटकर
नाम इस सम्बन्ध का एकादशी का व्रत लिखूं
चाहता हूँ मैं कि तुमको खूबसूरत ख़त लिखूं .
ख़त कि जिसमें मौन भी हो बात भी हो
ख़त कि जिसमें चाँद भी हो रात भी हो
ख़त कि जिसमें शबनमी सौगात भी हो
ख़त कि जिसमें स्नेह की बरसात भी हो
अनकहे किस्से भी हों कुछ अनछुए पल भी कुछेक
उम्र के इस मोड़ पर एक बचपनी हसरत लिखूं .
चाहता हूँ मैं कि तुमको ख़ूबसूरत ख़त लिखूं.
रेत के कच्चे घरोंदों-सा सजीला ख़त
गुलमुहर के फूल-सा कुछ लाल-पीला ख़त
याद की उतरन में संवरा तंग-ढीला ख़त
कोर पर आँखों की उभरा मन , पनीला ख़त
इस बरस बरसात में चमके हैं ढेरों इन्द्रधनु
छोर की ख्वाहिश में उलझा मौन मन आहत लिखूं .
चाहता हूँ मैं कि तुमको ख़ूबसूरत ख़त लिखूं
ख़त कि जैसे अधखिले फूल की एक पाँखुरी
ख़त कि जैसे जेठ में पुरुवाईओ की झुरझुरी
ख़त कि जैसे भोर में बज उठी हो बांसुरी
ख़त कि जैसे रामगिरि से आ मिली अलकापुरी
बादलों को दूत भेजा था कभी एक यक्ष ने
ऋतुमती ऋतुओं की अलकें बांध संयम-व्रत लिखूं.
चाहता हूँ मैं कि तुमको ख़ूबसूरत ख़त लिखूं
ख़त कि जिससे मौन-मंदिर में बजें कुछ घंटियाँ
ख़त कि जिससे धूममय हों कामना की वेदियाँ
ख़त कि जिससे गूँज जाएँ गीत-गोविन्द-पंक्तियाँ
ख़त कि जिससे पा सके कान्ह बिछुड़ी कनुप्रिया
एक लोटा जल सुबह सूरज को एक दिन भेंटकर
नाम इस सम्बन्ध का एकादशी का व्रत लिखूं
चाहता हूँ मैं कि तुमको खूबसूरत ख़त लिखूं .
Tuesday, June 29, 2010
यक्ष-प्रश्न
बन्द आँखों से पढनी होगी तुम्हें
नए युग की गीता ,
बिना हाथों के तोडना होगा तुम्हें
गान्डीवों का गर्व
मेरे दोस्त,
बीमार , वृद्ध या मृतक देखकर
नहीं हो जाता हर कोई बुद्ध.
दीवार पर लिखी इबारत
चीखकर कहती है--
सीखो
अपने होने पर सवाल उठाना ,
तुम्हें मिल जाएगा जवाब
यक्ष-प्रश्नों का
युधिष्ठिर हुए बिना.
Thursday, June 24, 2010
पढ़ना-लिखना सीखो , ऐ मेहनत करनेवालो
अटारियों में अटकी रोशनी की किरण
सरकने लगी है
सरकंडे की छाजन के नीचे
काली पट्टियों पर दूधिया रेखाएं बनाने.
खड्डी खटकाते हाथ
लिखने लगे हैं
जूठन सहेजती आँखों की भाषा
लोकतंत्र के मुखपृष्ठ पर .
अंगूठे की रेखाओं का
कमला, विमला या रामप्रसाद हो जाना
प्रस्तावना है
एक नए संविधान की ,
धाराओं, अनुच्छेदों की जकड से मुक्त
गुलाबी खम्बों के बाहर भी अस्तित्व है जिसका.
पथरायी अँगुलियों
धुंधलाई आँखों
लिखा-पढ़ा हर अक्षर
घोषणापत्र है
उस नयी सुबह का
जो धूप बाँटने से पहले
कुल, जाति या धर्म नहीं पूछती.
( दूरदर्शन पर साक्षरता सम्बन्धी एक विज्ञापन देखकर )
सरकने लगी है
सरकंडे की छाजन के नीचे
काली पट्टियों पर दूधिया रेखाएं बनाने.
खड्डी खटकाते हाथ
लिखने लगे हैं
जूठन सहेजती आँखों की भाषा
लोकतंत्र के मुखपृष्ठ पर .
अंगूठे की रेखाओं का
कमला, विमला या रामप्रसाद हो जाना
प्रस्तावना है
एक नए संविधान की ,
धाराओं, अनुच्छेदों की जकड से मुक्त
गुलाबी खम्बों के बाहर भी अस्तित्व है जिसका.
पथरायी अँगुलियों
धुंधलाई आँखों
लिखा-पढ़ा हर अक्षर
घोषणापत्र है
उस नयी सुबह का
जो धूप बाँटने से पहले
कुल, जाति या धर्म नहीं पूछती.
( दूरदर्शन पर साक्षरता सम्बन्धी एक विज्ञापन देखकर )
Wednesday, June 23, 2010
वही मैं हूँ - वही तुम हो
वही मैं हूँ
वही तुम हो
वही सुनसान सड़कें.
वही सोए हुए पत्ते
वही सीली हवाएं
वही नादान गुलमोहर
वही चुप-सी दिशाएँ
वही आकाश में चंदा
वही तारों की टिम-टिम
वही झींगुर की तानें
वही है ओस भी मद्धिम
वही मैं हूँ
वही तुम हो
वही सुनसान सड़कें.
वही कुछ फूल-से किस्से
वही कुछ धूप-सी बातें
वही कुछ दीप-से वादे
वही कुछ गंध-सी साधें
वही चुप-चाप संग चलना
वही बेबात का हँसना
वही रुक देखना यूँ ही
वही मनना, मचल जाना
वही मैं हूँ
वही तुम हो
वही सुनसान सड़कें.
वही किस्से पडोसी के
वही माँ की बीमारी
वही भाई की नादानी
वही अनजान लाचारी
वही इतिहास के चर्चे
वही फ़िल्मी ठहाके
वही संवाद नाटक-से
वही झुकना अदा से
वही मैं हूँ
वही तुम हो
मगर वर्षों की दूरी है
न वो साझा समंदर है
न वो पहले- सी लहरें हैं
मेरे भी पांव में बंधन
और तुम पर भी तो पहरे हैं
कहीं मैं भी हिचकता हूँ
तो कुछ तुम भी छुपाते हो
न पूरा सच मैं कहता हूँ
न तुम ही सच बताते हो
वही सब कुछ मगर फिर भी
कहीं कुछ रिक्तता-सी है
जुड़े हैं हम बहुत लेकिन
कहीं कुछ भ्रंश बाकी है
न वो मैं हूँ
न वो तुम हो
वही सुनसान सड़कें .
मेरा 'मैं' मुझे रोके
तुम्हारा 'तुम' तुम्हें बांधे
बहुत मुश्किल है मुक्त होना
खुलें और हो रहें आधे
न ये मंज़ूर है तुमको
न ये मंज़ूर है मुझको
मगर कुछ कम नहीं यह भी
कि हम तुम साथ हैं दोनों .
न वो मैं हूँ
न वो तुम हो
वही सुनसान सड़कें.
वही तुम हो
वही सुनसान सड़कें.
वही सोए हुए पत्ते
वही सीली हवाएं
वही नादान गुलमोहर
वही चुप-सी दिशाएँ
वही आकाश में चंदा
वही तारों की टिम-टिम
वही झींगुर की तानें
वही है ओस भी मद्धिम
वही मैं हूँ
वही तुम हो
वही सुनसान सड़कें.
वही कुछ फूल-से किस्से
वही कुछ धूप-सी बातें
वही कुछ दीप-से वादे
वही कुछ गंध-सी साधें
वही चुप-चाप संग चलना
वही बेबात का हँसना
वही रुक देखना यूँ ही
वही मनना, मचल जाना
वही मैं हूँ
वही तुम हो
वही सुनसान सड़कें.
वही किस्से पडोसी के
वही माँ की बीमारी
वही भाई की नादानी
वही अनजान लाचारी
वही इतिहास के चर्चे
वही फ़िल्मी ठहाके
वही संवाद नाटक-से
वही झुकना अदा से
वही मैं हूँ
वही तुम हो
मगर वर्षों की दूरी है
न वो साझा समंदर है
न वो पहले- सी लहरें हैं
मेरे भी पांव में बंधन
और तुम पर भी तो पहरे हैं
कहीं मैं भी हिचकता हूँ
तो कुछ तुम भी छुपाते हो
न पूरा सच मैं कहता हूँ
न तुम ही सच बताते हो
वही सब कुछ मगर फिर भी
कहीं कुछ रिक्तता-सी है
जुड़े हैं हम बहुत लेकिन
कहीं कुछ भ्रंश बाकी है
न वो मैं हूँ
न वो तुम हो
वही सुनसान सड़कें .
मेरा 'मैं' मुझे रोके
तुम्हारा 'तुम' तुम्हें बांधे
बहुत मुश्किल है मुक्त होना
खुलें और हो रहें आधे
न ये मंज़ूर है तुमको
न ये मंज़ूर है मुझको
मगर कुछ कम नहीं यह भी
कि हम तुम साथ हैं दोनों .
न वो मैं हूँ
न वो तुम हो
वही सुनसान सड़कें.
Sunday, June 13, 2010
एक पूरा बरस : अधूरा समझौता
तुमने ठीक ही लिखा है--
न आने पायें उदासी के झोंके ,
फुहारें दर्द की न पड़ें सुबह-शाम,
आँखों में परछाइयाँ बादलों की
थमें केवल, जमें नहीं सावन में .
--- यह सब कुछ चाहता हूँ मैं भी
पर दोस्त,
एक पूरा बरस होता है दो सावनों के बीच
तीन ------सौ------पैंसठ------दिन ,
एक पूरा पतझड़ ,
एक पूरा चिल्ला जाड़ा ,
एक पूरा धुआंसा फागुन ,
एक पूरा उदास वसंत,
एक अ-स्मरणीय शाम
एक अप्रत्याशित खबर
एक अधूरे समझौते की शुरुआत
और एक पूरे सपने का अंत .
इस अन्तराल के बाद
अब नहीं आते झोंके उदासी के
दर्द की फुहारें नहीं पड़तीं
नहीं जमतीं बादलों की परछाइयां
बस अक्सर कसकती है एक पहचान
टीसता है एक परिचय
भर आती हैं ऑंखें
और ख़ाली हो जाता है मन .
न आने पायें उदासी के झोंके ,
फुहारें दर्द की न पड़ें सुबह-शाम,
आँखों में परछाइयाँ बादलों की
थमें केवल, जमें नहीं सावन में .
--- यह सब कुछ चाहता हूँ मैं भी
पर दोस्त,
एक पूरा बरस होता है दो सावनों के बीच
तीन ------सौ------पैंसठ------दिन ,
एक पूरा पतझड़ ,
एक पूरा चिल्ला जाड़ा ,
एक पूरा धुआंसा फागुन ,
एक पूरा उदास वसंत,
एक अ-स्मरणीय शाम
एक अप्रत्याशित खबर
एक अधूरे समझौते की शुरुआत
और एक पूरे सपने का अंत .
इस अन्तराल के बाद
अब नहीं आते झोंके उदासी के
दर्द की फुहारें नहीं पड़तीं
नहीं जमतीं बादलों की परछाइयां
बस अक्सर कसकती है एक पहचान
टीसता है एक परिचय
भर आती हैं ऑंखें
और ख़ाली हो जाता है मन .
Saturday, June 12, 2010
दोस्ती देने का नाम है -- तुमने कहा था
स्वप्न पलकों पर तिरा करते थे जो अक्सर ,
कदम थके-थके जो
बहक-बहक जाते थे
मुड़ने के लिए चलते-चलते,
पुरवा पवन वह ओस-भीगी
सिहरा जाती थी सीला मन जो,
रीत गये सभी
कहो तो क्यों !!
सिर पटक-पटक
जाती है बिखर लहर ,
फूट-फूट जाते हैं
इस पहाड़ी नदी के बुल्ले
कुछ देर कुलबुलाकर ,
देर तक पकड़ने की कोशिश
किया करती थीं तुम जिन्हें.
सांझ के पाखी लौटते तो हैं घर
झुण्ड-के-झुण्ड
पंख फडकाते पंक्तिबद्ध ,
पर लय खो-सी गयी लगती है.
पोखरी का जल ,
जिसे चुपचाप भरते थे
अंजुरी में हर शाम हम-तुम ,
हो गया है गंभीर
कुछ अधिक ही गंभीर ,
सूरज ढलने के बाद
हिल नहीं पड़ता है अक्सर
किसी के मुस्कुरा भर देने से .
सर्ग शाकुंतलम के सभी
बांचे थे हमने एक साथ
छाँव में जिसकी ,
अमोला अल्हड वह अमलताश का
झूम नहीं उठता है अक्सर बेबात ही.
पढ़ ली होंगी तुमने कुछ किताबें और
सीख लिए होंगे कुछ और
तीन-पांच के धंधे ,
बढ़ गयी हो चमक आँखों की
नामुमकिन नहीं.
मुमकिन है, मिल गया हो
कन्धा कोई
रो लेने को सभी दुःख ,
भोगे-अनभोगे यथार्थ के.
फिर भी सच यही है कि
तुमने की थी दोस्ती मुझसे
और एक शाम यूँ ही
भाग्य-रेखा को मेरी
गोदते हुए दूब की डंठल से
कह दिया था तुमने --
दोस्ती देने का नाम है.
लिया तो तुमने भी कुछ नहीं ,
मैं रिक्त हूँ
पर यह भी सत्य है .
Tuesday, June 8, 2010
लील रहा है महानगर
मेरी परिभाषा में शामिल
पीपल , पोखर , धूल गांव की
काली , डीह , कराही - पियरी ,
कजरी , चैता , फाग , बिदेसिया ,
ताल, चिरैया ,पागल पुरवा ,
चौखट , पनघट , घूंघट , गागर,
साँझ ढले की दीया-बाती ,
पांव महावर छम-छम पायल ,
मुरली , मूसल , जांता-चक्की ,
अक्कड़-बक्कड़, ओल्हा-पाती,
राधा-मोहन-नन्द-यशोदा
धीरे-धीरे धूमिल होकर
खोते जाते महानगर में.
सबने मिलकर लिखा और मैं
कोशिश करता रहा स्वयं को
पढ़ पाऊं अपनी आँखों से
बिन पनियाये साफ-साफ .
कुछ नयी किताबें , नए विचार
सिद्धांत नए , सब तीन-पांच
विज्ञान, ज्ञान , कला , दर्शन ,
जीवन जीने के विविध ढंग
कुछ पुण्य-पाप , कुछ धर्म-अधर्म
सब राग-विराग , नरक-स्वर्ग
जाले-से उतरे आँखों में
मैं भूल गया वह भाषा , वह लिपि
जिसमें मुझको लिखा गया
जिसमें पला-बढ़ा-पलुहाया
जिससे मेरा कण-कण सिरजा
जिसने गढ़ा 'मुझे' , 'मेरा' , 'मैं'.
मैं , पानी पर पलता मनीप्लांट
अभिमान सभ्यता का पाले
पैरों में संस्कृति की बेडी
तैयार खड़ा बिक जाने को
मल्टीनेशनल - प्रोडक्ट-सा .
तन के , मन के , इस जीवन के
सारे बंधन , सारे क्रन्दन
छंद , ताल , लय और स्पंदन
तुलते एक तुला में केवल ---
किसको कितना लाभ हुआ !!
जैसे कोई वृक्ष कटा , जड़
बची रही गल-सड़ जाने को
ऐसे ही तन बेच दिया , मन
सड़ता जाता पल-प्रतिपल .
अंश-अंश कर
बूँद-बूँद भर
लील रहा है महानगर .
पीपल , पोखर , धूल गांव की
काली , डीह , कराही - पियरी ,
कजरी , चैता , फाग , बिदेसिया ,
ताल, चिरैया ,पागल पुरवा ,
चौखट , पनघट , घूंघट , गागर,
साँझ ढले की दीया-बाती ,
पांव महावर छम-छम पायल ,
मुरली , मूसल , जांता-चक्की ,
अक्कड़-बक्कड़, ओल्हा-पाती,
राधा-मोहन-नन्द-यशोदा
धीरे-धीरे धूमिल होकर
खोते जाते महानगर में.
सबने मिलकर लिखा और मैं
कोशिश करता रहा स्वयं को
पढ़ पाऊं अपनी आँखों से
बिन पनियाये साफ-साफ .
कुछ नयी किताबें , नए विचार
सिद्धांत नए , सब तीन-पांच
विज्ञान, ज्ञान , कला , दर्शन ,
जीवन जीने के विविध ढंग
कुछ पुण्य-पाप , कुछ धर्म-अधर्म
सब राग-विराग , नरक-स्वर्ग
जाले-से उतरे आँखों में
मैं भूल गया वह भाषा , वह लिपि
जिसमें मुझको लिखा गया
जिसमें पला-बढ़ा-पलुहाया
जिससे मेरा कण-कण सिरजा
जिसने गढ़ा 'मुझे' , 'मेरा' , 'मैं'.
मैं , पानी पर पलता मनीप्लांट
अभिमान सभ्यता का पाले
पैरों में संस्कृति की बेडी
तैयार खड़ा बिक जाने को
मल्टीनेशनल - प्रोडक्ट-सा .
तन के , मन के , इस जीवन के
सारे बंधन , सारे क्रन्दन
छंद , ताल , लय और स्पंदन
तुलते एक तुला में केवल ---
किसको कितना लाभ हुआ !!
जैसे कोई वृक्ष कटा , जड़
बची रही गल-सड़ जाने को
ऐसे ही तन बेच दिया , मन
सड़ता जाता पल-प्रतिपल .
अंश-अंश कर
बूँद-बूँद भर
लील रहा है महानगर .
Friday, June 4, 2010
और सुनो अनु
मैं अब भी लिखता हूँ
तुम पर कवितायें , अनु
जबकि तुम सुनती हो
नवजात शिशु की सांसें
पति के सीने पर सिर रख.
मैं अब भी ढूंढता हूँ
तुम्हारे लिए उपमाएं ,
गढता हूँ टटके बिम्ब
और बनाता हूँ नए-नए अर्थ
तुम्हारे कहे उन्हीं पुराने शब्दों से .
मैं अब भी मोड़ता हूँ
पन्नों के कोने
बनाता हूँ दूब की पैतियाँ
खींचता हूँ किताबों पर रेखाएं
और पढ़ता हूँ तुम्हारा नाम .
गलत होवोगी तुम
यदि इसे प्रेम समझो
या फिर , प्रेम का नॉस्टेल्जिया.
यह हैंगओवर भी नहीं है
किसी अत्यन्त गहरे अनुभव का.
मित्र कहते हैं बूढ़ा हो रहा हूँ
पर मुझे लगता है, इसी बहाने जीवित तो हूँ मैं !
तुम पर कवितायें , अनु
जबकि तुम सुनती हो
नवजात शिशु की सांसें
पति के सीने पर सिर रख.
मैं अब भी ढूंढता हूँ
तुम्हारे लिए उपमाएं ,
गढता हूँ टटके बिम्ब
और बनाता हूँ नए-नए अर्थ
तुम्हारे कहे उन्हीं पुराने शब्दों से .
मैं अब भी मोड़ता हूँ
पन्नों के कोने
बनाता हूँ दूब की पैतियाँ
खींचता हूँ किताबों पर रेखाएं
और पढ़ता हूँ तुम्हारा नाम .
गलत होवोगी तुम
यदि इसे प्रेम समझो
या फिर , प्रेम का नॉस्टेल्जिया.
यह हैंगओवर भी नहीं है
किसी अत्यन्त गहरे अनुभव का.
मित्र कहते हैं बूढ़ा हो रहा हूँ
पर मुझे लगता है, इसी बहाने जीवित तो हूँ मैं !
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