Wednesday, November 23, 2011

विदाई.... एक व्यक्तिगत कथा

कहीं छोड़ आया हूँ
अपनी एक प्यारी-सी चीज
शाम के धुंधलके में
कोहरा ओढ़े दूर जंगल में
लांघकर शहर, गाँव, पहाड़ , नदियाँ .
मन उदास है, गहरा उदास
मन चुप है, निहायत चुपचाप
दुःख हो , ऐसा नहीं लगता
दर्द है , कुछ-कुछ प्रिय-सा.


सर्पीली सड़कों से गुजरते हुए
सुनाता रहा पहाड़ी लड़की का गीत
बालों में घुमाते हुए उँगलियाँ
बांटता रहा अतीत के किस्से
हिस्से-हिस्से खोलता रहा
मन के तमाम बंद कमरे
दिखाता रहा कोने-अंतरे एक-एककर
पोर-पोर बींधती रही आकुल तृप्ति .


स्मृति के निर्झर झरते रहे कलकल
अविकल ऊँचाइयों  से उतरते
खुल गयीं सब गांठें मन की
और फैल गयी चांदनी रात
किरण-किरण चीड के पेड़ों पर
बात करते, बात सुनते .


देह तपी थी सोना हो गयी 
मन कांपा था अर्घ्य की तरह
संस्कार सब छीज गए
रीत गया बूँद-बूँदकर अहम्
बची रह गयी बस एक कसक
खालीपन से भरी-भरी .


नदियाँ-पहाड़-जंगल सब पार किये
पार किया केशों का गझिन आकर्षण
देह का दीप्त दरिया
मन का मोहक आकाश
और छोड़ आया
अपना  एक हिस्सा
कोहरा ओढ़े जंगल में.


वापसी को मुड़े कदम कांपे
कांपा कहीं भीतर विश्वास
स्वयं के मज़बूत होने का
हिलते हाथों संग हिला
अधिकार का महीन आवरण
और उग आयीं पीठ पर एक जोड़ी आँखें.





  

Thursday, October 27, 2011

हमारे प्रेम का शहर

न उस शहर मे अब तुम रहती हो
न उस शहर मे अब मै रहता हूँ

पर हम दोनो ही के पास है
अपने-अपने हिस्से का वह शहर
जो कहीँ भी बस जाता है
आपस मे बात करते ही.


यह और बात है कि
प्रेम करने से होने तक की खबर
क़त्ल की कहानियो के साथ छपती थी
हमारे शहर के अखबार मे
रास्ते किनारे पेड पर अटकी लाल रिबन-सी याद
हवाओ मे फडफडाती अब भी है
समय के साथ बदरंग होकर भी.


शहर बदलता है और लोग भी

गली-मोहल्लो-चौराहो की सूरत के साथ

मगर ज़िन्दा रहता है एक शहर
हमारे-तुम्हारे भीतर बचे प्रेम-सा

बिल्कुल वैसा ही मन के किसी कोने मे

जैसा देखा था हमने उसे एक-दूसरे के प्रेम मे.

Monday, September 19, 2011

मन की पोथी

बांटता ग़म सभी साथ तेरे मगर 
तुझपे जाने मुझे क्यों भरोसा न था
यह नहीं कि तुझे मैंने पूजा नहीं 
या कभी टूटकर तूने चाहा  न था

      मेरी आँखें प्रिये तेरी आँखों में थीं
     तेरी साँसों की मधुगंध थी सांस में
     मेरे होंठों से पिघली हँसी में तू ही 
     दर्द-सा ले फिरा तुझको एहसास में

पर निरंतर रही टीसती एक व्यथा
अश्रुजल में तेरे जिसको धोया न था

      साँझ की हर ढलकती किरण लिख गयी 
     मौन के अक्षरों में कथाएँ कई
     रात-सा मन पसरता रहा दूर तक
     बाँध लेने को लाखों व्यथाएँ नई

भागवत की कथा-सा मैं बहता मगर
आवरण मन की पोथी का खोला न था . 

Wednesday, September 7, 2011

तुम्हारी पाती

तुम्हारी पाती मिली अबोध 
तुम्हारी पाती मिली अजान
नयन के कोरों पर चुपचाप
उभर आई पिछली पहचान 

     किताबों में डूबा मैं आज 
     ढूंढता  था जीवन के राज़ 
     तभी धीरे से आकर पास 
     तुम्हारे ख़त ने दी आवाज़

मुझे खोलो मैं थककर चूर
संभालो लाया हूँ मुस्कान 

     नयन से देखा जैसे गीत 
     लिया अधरों से छू संगीत 
     लगा है ऐसा ही कुछ आज
     तुम्हारा ख़त पाकर मनमीत 

उडूं मैं नभ में पांखें खोल
सुनाता फिरूं तुम्हारे गान

     जगे हैं सोए मन के भाव 
     अखरने लगा बहुत अलगाव
     न जाने बीते दिन क्यों आज
     कसकते जैसे कोई घाव 

हिये की पगली छिछली पीर
गयी अधरों पर बन मुस्कान
तुम्हारी पाती मिली अबोध 
तुम्हारी पाती मिली अजान.

(प्रथम दो पंक्तियाँ स्व. डॉ धर्मवीर भारती जी से साभार)



Wednesday, August 31, 2011

पल्टुआ, भैंस और स्टीफन हाकिंग

पल्टुआ बतियाता ही रह गया 
खड़ा नीम की आड़ में
गवने से लौटी
दुक्खी काका की बेटी फुलमतिया से
और भैंस चर गयी लोबिया 
चन्नर पांड़े के तलहवा खेत में.

हमारे समय के 
सबसे बड़े ब्रह्माण्डवेत्ता -- स्टीफन हाकिंग     
कह रहे हैं 
स्वर्ग-नरक कुछ भी नहीं 
कुछ नहीं बचता मृत्यु के बाद 
मर जाता है 
बस मर जाता है
एक बारगी ही समूचा अस्तित्व 
गणितीय प्रमेयों के अंतिम निष्कर्ष यही कहते हैं.

पल्टुआ सिंगुलरीटी थेओरम्स नहीं जानता
नहीं जानता क्वांटम ग्रेविटी 
भैंस को भी नहीं पता 
चमरौंधा लेकर आ रहे हैं चन्नर पांड़े
लुढ़कते-पुढ़कते-गरियाते 
फुलमतिया भी जानती है तो बस इतना --
देख ली गयी तो बदनामी होगी .

मैं , जो कि द्रष्टा हूँ 
कन्फ्यूज हो गया हूँ
सेकेण्ड ला ऑफ़ थर्मोडायनेमिक्स मदद नहीं करता 
और न ही अनसर्टेंटी प्रिंसिपल 

साइकोलोजिकल ऐरो ऑफ़ टाइम कहता है 
भैंस पिटेगी और पल्टुआ गरियाया जायेगा 
फुलमतिया भाग निकलेगी घर की ओर

थर्मोडायनेमिक ऐरो ऑफ़ टाइम बताता है
भैंस के पेट में पहुँच गया लोबिया
अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर गमन है
घटती लगती है एंट्रोपी
पर यह अनर्थ है,
चबाने में भैंस ने खर्च की जो ऊर्जा
बढ़ा देती है वह ब्रह्माण्ड की सकल एंट्रोपी
अर्थात अव्यवस्था !

यानी की बढ़ रहा है सब कुछ
व्यवस्था से अव्यवस्था की ओर
सतत अबाधित
और मैं जितना समझ पाता हूँ इस मामले में
भैंस भी करती है प्रभावित ब्रह्माण्ड को
उतना ही जितना कि स्टीफन हाकिंग .

Sunday, August 21, 2011

एक बरसाती रात

रात आई बहुत देर तक याद तू 
रात बादल गरजते रहे देर तक
रात आँखों में चुभती रही रौशनी 
रात जुगनू चमकते रहे देर तक

रात आंधी चली रात बिजली गिरी
जाने किसके भला आशियाने जले 
ख़त मिला था तेरा कल ढली सांझ को
और तेरे ही ख़त सब पुराने जले

रात बजती रही धुन कोई अनसुनी  
रात वादे कसकते रहे देर तक

रात मैंने किये पुण्य संकल्प सब
प्रिय सुनो यह सभी अब तुम्हारे हुए
रात मैंने लिखी एक ताज़ा ग़ज़ल 
तन को जीते हुए मन को हारे हुए

रात बीते बरस आँख की कोर से 
धीरे-धीरे छलकते रहे देर तक

रात आये न जाने कहाँ से भला
और बादल उड़ाकर कहाँ ले गए  
चढ़ते सूरज की पावन गवाही में जो 
स्वप्न आँखों में अपनी संभाले गए

रात उठती रही देर तक गंध भी 
रात सपने महकते रहे देर तक 
 

Saturday, July 23, 2011

बरसो सावन बरसो

बरसो सावन बरसो

गोबर की परधानी भीगे
काली कुतिया कानी भीगे
इटली की महारानी भीगे
आँख का उनकी पानी भीगे
बरसो सावन बरसो

मनमोहन और अन्ना भीगें
खाकी लाल घुटन्ना भीगें
लोकपाल कंधे पर धरके
नाचें तन्ना-तन्ना भीगें
बरसो सावन बरसो

खाएं प्रिंस पकोड़ा भीगें
हसन अली के घोडा भीगें
राजा और यदियुरप्पा से कुछ  
बचे-खुचे तो कौडा  भीगें
बरसो सावन बरसो

जनपथ भीगे संसद भीगे
इजलासों का गुम्बद भीगे
छाती पर चढ़कर बैठी  जो
काठ की कुर्सी शायद भीगे
बरसो सावन बरसो
बरसो सावन बरसो




Wednesday, July 20, 2011

सावन के मेघ

जाने किसकी आँखें उमड़ीं
नभ में छाए काले मेघ
किस विरही के भेजे आए
क्या संदेश संभाले मेघ

     तन की पाती मन के नाम
     भूला-बिसरा कोई काम
     याद दिलाने को आयी है
     फिर सावन की भीगी शाम

बरस रहे हैं धो डालेंगे
विस्मृतियों के जाले मेघ ।

Friday, July 15, 2011

जीवधारी रुपए

गाड़े हुए रुपए जीवधारी हो जाते हैं
एक लंबे समय के बाद
एक लंबे समय पहले सुनी थी यह बात
दादी से किसी कहानी के दरम्यान

लंबे समय पहले की बातें
सच ही हो जाती हैं
लंबे समय के बाद

अब नहीं गाड़ता है कोई भी
रुपए दीवार या ज़मीन में
यह तमाम जीवधारी रुपए
डोलते फिरते हैं जो
राजपथ-जनपथ-संसद के गलियारों में
पुराने दिनों के गाड़े हुए हैं

कहानियाँ दादी की थीं
दादी कहानियों में चली गईं
लंबा समय अब लंबा नहीं रहा
जीवधारी रुपए अब लौटाने ही होंगे
अपने गड्ढों में लंबे समय के बाद
संभलने लगी हैं कुदालें
कसमसाने लगे हैं उनके बेंट
और ज़मीनें तैयार होने लगी हैं ।

Tuesday, July 5, 2011

तुमको बात बदलते देखा

हमने सूरज ढलते देखा
सुबहो-शाम पिघलते देखा

घर से माँ का ख़त आया है
आँखें मलते-मलते देखा

इस सावन में घर जाऊंगा
सपना चलते-चलते देखा

देखी होगी राह किसी ने
दोपहरी को गलते देखा

मन जाने कैसा हो आया
तुमको बात बदलते देखा

तुम भी अपने-से लगते हो
तुमको भी मन छलते देखा

शायद फागुन आने वाला
मन को आज फिसलते देखा

आज किसी ने सच बोला है
पत्थर आज सँभलते देखा